‘सहयोग पोर्टल’ साइबर अपराध के खिलाफ डिजिटल ढाल या ‘गुप्त सेंसरशिप’ का नया हथियार?

रायपुर: गृह मंत्रालय द्वारा साइबर अपराध समन्वय केंद्र के माध्यम से विकसित ‘सहयोग पोर्टल’ आज देश के सबसे शक्तिशाली प्रशासनिक उपकरणों और सबसे विवादास्पद डिजिटल शासन तंत्रों में से एक बन चुका है। जिसे भारत में ऑनलाइन Content Regulation के इतिहास में पिछले दो वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव बताया जा रहा है।
अक्टूबर 2024 में लॉन्च किया गया यह स्वचालित सामग्री-हटाने (content-takedown) वाला मंच जहाँ एक तरफ साइबर अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी, डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) और सांप्रदायिक अफवाहों के खिलाफ सरकार की एक ‘डिजिटल ढाल’ है; वहीं दूसरी तरफ, नागरिक स्वतंत्रता समूहों का आरोप है कि इसने बिना किसी न्यायिक निरीक्षण के एक समानांतर, दमनकारी सेंसरशिप प्रणाली को जन्म दे दिया है। 950 मिलियन उपयोगकर्ताओं और 3,375 करोड़ रुपये की सोशल मीडिया अर्थव्यवस्था वाले भारत में, यह पोर्टल प्रशासनिक दक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच एक नया युद्धक्षेत्र बन गया है।
डिजिटल प्रवर्तन का नया खेल
पारंपरिक रूप से सरकारें सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 69A के तहत सामग्री ब्लॉक करती थीं, जिसमें लिखित कारण, समिति द्वारा समीक्षा और प्रभावित पक्ष को सुनने जैसे कड़े सुरक्षा उपाय शामिल थे (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्रेया सिंघल’ मामले में अनिवार्य किया था)।
इसके विपरीत, सहयोग पोर्टल धारा 79(3)(b) के तहत काम करता है:
‘सेफ हार्बर’ का खात्मा: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उपयोगकर्ताओं की पोस्ट के लिए जो कानूनी सुरक्षा (Safe Harbor) मिलती है, वह सरकार से “वास्तविक जानकारी” (Actual Knowledge) मिलने के बाद समाप्त हो जाती है यदि वे सामग्री नहीं हटाते।
केंद्रीकृत डैशबोर्ड: इसके जरिए केंद्रीय मंत्रालयों और राज्यों की पुलिस सीधे Google, Meta, X और Telegram को टेकडाउन नोटिस भेजती है।
कड़ी समय-सीमा: नए आईटी संशोधनों के तहत कंपनियों को 3 से 48 घंटे के भीतर सामग्री हटानी होती है, अन्यथा वे अपनी कानूनी प्रतिरक्षा खो देती हैं और जांच एजेंसियां उनके खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर सकती हैं।
बड़े पैमाने पर कार्रवाई: आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी और कॉर्पोरेट आंकड़ों से साफ है कि इस पोर्टल ने राज्य की डिजिटल सेंसरशिप क्षमता को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया है:
1.11 लाख से अधिक लिंक ब्लॉक: गृह मंत्रालय की 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च, 2025 तक इस पोर्टल के माध्यम से 1.11 लाख से अधिक संदिग्ध ऑनलाइन सामग्रियां हटाई या ब्लॉक की गईं। एजेंसियों ने हर दिन औसतन 290 टेकडाउन नोटिस जारी किए।
X (Twitter) की गवाही: कंपनी की पारदर्शिता रिपोर्ट बताती है कि 2025 के शुरुआती छह महीनों में उसे सामग्री हटाने के 29,118 सरकारी अनुरोध मिले, जिनमें से उसने 26,000 से अधिक का पालन किया। इसके अलावा, 2024-25 के बीच विभिन्न टेक कंपनियों को 179 औपचारिक नोटिस मिले, जिसमें अकेले Telegram को 81 और YouTube को 53 नोटिस भेजे गए।
आत्मसमर्पण या कानूनी जंग?
Meta (Facebook, Instagram): इसने पोर्टल के साथ अपनी प्रणालियों को API के जरिए सीधे जोड़ लिया है। नागरिक अधिकार संगठनों का दावा है कि Meta इतनी तेजी से सामग्री हटाता है कि बाद में गलती का पता चलने पर भी पोस्ट बहाल नहीं होतीं।
Google और YouTube: इनका रुख भी सहयोगात्मक रहा है, हालांकि वे टेकडाउन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर न्यायिक जांच का सामना कर रहे हैं।
X (Twitter) का विद्रोह: ‘X’ ने इस पोर्टल की वैधता को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। कंपनी का तर्क है कि यह बिना वैधानिक सुरक्षा उपायों के “सेंसरशिप तंत्र” है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसकी अपीलें अभी लंबित हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी पर ‘खौफ का माहौल’
यह पोर्टल अब देश की शीर्ष अदालत के रडार पर है। कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इसे “गुप्त सेंसरशिप” (Stealth Censorship) कहा गया है। आलोचकों का तर्क है कि भले ही सरकार खुद सामग्री डिलीट नहीं करती, लेकिन भारी कानूनी और आपराधिक कार्रवाई के डर से सोशल मीडिया कंपनियां बिना किसी विरोध के तुरंत पोस्ट हटा देती हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विचारकों के बीच “खौफ का माहौल” (Chilling Effect) बन रहा है, जिससे लोग खुद को सेंसर (Self-Censorship) करने लगे हैं।
सरकार का पक्ष और वैश्विक मॉडल से तुलना
गृह मंत्रालय इन सभी आरोपों को खारिज करता है। सरकार का तर्क है कि आज के डिजिटल युग में वित्तीय धोखाधड़ी, दंगों को भड़काने वाली अफवाहों और राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों से निपटने के लिए दिनों के बजाय मिनटों में कार्रवाई जरूरी है।
वैश्विक स्तर पर, यूरोपीय संघ (DSA) और ब्रिटेन में भी अवैध सामग्री हटाने के आदेश दिए जाते हैं, लेकिन वहां सख्त पारदर्शिता रिपोर्ट, उपयोगकर्ताओं को अपील का अधिकार और न्यायिक निरीक्षण अनिवार्य है। वहीं, अमेरिका केवल आतंकवाद या बाल यौन शोषण जैसे मामलों में ही सीधे हस्तक्षेप करता है।
निष्कर्ष और क्षेत्रीय चिंताएं
सहयोग पोर्टल साइबर अपराधियों से निपटने में राज्य को अचूक शक्ति देता है, लेकिन प्रशासनिक गति के कारण लोकतांत्रिक पारदर्शिता की अनदेखी हो रही है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के संदर्भ में यह चिंता और गहरी हो जाती है। जहां सरकार पहले से ही भूमि अधिकारों, आदिवासी कल्याण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ एक संवेदनशील मोर्चे पर है, वहां इस पोर्टल की अपारदर्शी शक्तियों का दुरुपयोग स्थानीय शिकायतों को दबाने या आदिवासियों के अधिकारों की आवाज उठाने वाले डिजिटल मंचों को खामोश करने के लिए किया जा सकता है। डिजिटल गवर्नेंस में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए इस पोर्टल को प्रशासनिक गति के साथ-साथ लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।

