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अलविदा बशीर बद्र: ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…’, उर्दू शायरी के बेताज बादशाह का 91 वर्ष की आयु में निधन

1992 के दंगों का वो गहरा जख्म, जिसने जिंदगी भर की कमाई छीन ली, उम्र के आखिरी पड़ाव में डिमेंशिया ने छीन ली थीं अपनी ही यादें

उर्दू अदब (साहित्य) के एक सुनहरे युग का आज अंत हो गया। अपनी सरल और आम आदमी के जज्बातों को बयां करने वाली शायरी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके इंतकाल की खबर से साहित्य, शायरी और फिल्मी दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है। यह केवल गजल की दुनिया के लिए नहीं, बल्कि हर उस शख्स के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसने कभी प्यार, दर्द या जिंदगी की कशमकश को शब्दों में महसूस किया हो।

आम आदमी की भाषा में पिरोए गहरे जज्बात

डॉ. बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के जाल से निकालकर आम हिंदुस्तानी जुबान में ढाल दिया। उनकी गजलें सीधे दिल में उतर जाती थीं। उन्होंने मोहब्बत, समाज, राजनीति और इंसानी रिश्तों की बारीकियों को इतने सहज अंदाज में पेश किया कि वह मुशायरों की जान बन गए। उनके रचे गए शेर आज भी लोगों की जुबां पर आम बोलचाल की तरह बसे हुए हैं।

जिंदगी के सफर में झेले कई दर्द

15 फरवरी 1935 को कानपुर में जन्मे बशीर बद्र का जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने लंबे समय तक मेरठ में अध्यापन का कार्य किया। लेकिन 1992 के मेरठ दंगों ने उनके जीवन को गहरा घाव दिया। इस दंगे में उनका घर और उनकी जिंदगी भर की कमाई (उनकी कई अनमोल पांडुलिपियां और किताबें) जलकर खाक हो गईं। इस त्रासदी से टूटकर वह अपनी पत्नी के साथ भोपाल आ गए और फिर जीवन के अंतिम समय तक वहीं रहे।

उम्र के आखिरी पड़ाव में उन्हें डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) ने घेर लिया था, जिसके चलते वह अपनी ही रची हुई कालजयी शायरी और पहचान भूलने लगे थे।

बशीर बद्र के वो शेर, जो हमेशा जिंदा रहेंगे

भले ही आज डॉ. बशीर बद्र हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी कलम से निकले मोती हमेशा चमकते रहेंगे। उनके कुछ ऐसे शेर, जो आज भी हर महफिल की शान बढ़ाते हैं:

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”

“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

“अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा, मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।”

सम्मान और उपलब्धियां

गजल और साहित्य की दुनिया में उनके इसी उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें साल 1999 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था। इसी साल उन्हें उनके कविता संग्रह ‘आस’ (Aas) के लिए प्रतिष्ठित ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से भी नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें मीर अकादमी पुरस्कार और कई अन्य राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया।

एक युग का अंत:

डॉ. बशीर बद्र का जाना केवल एक शायर का जाना नहीं है, बल्कि उस आवाज का खामोश हो जाना है जो भीड़ में भी इंसान के अकेलेपन को समझती थी। उनकी देह भले ही इस फानी दुनिया को छोड़ गई है, लेकिन उनकी यादें और उनकी कालजयी शायरी लोगों के दिलों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है। उनके ही शब्दों में कहें तो— “शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।”

साहित्य जगत इस महान विभूति को हमेशा अपनी नम आंखों से याद रखेगा।

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