
नई दिल्ली। बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के सामने बिहार और मध्य प्रदेश के दो अहम उपचुनाव पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनकर उभरे हैं। बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर उठे सवालों ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। दोनों सीटों पर पार्टी ने नए चेहरों पर भरोसा जताया है, लेकिन फैसलों के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और विपक्ष के हमलों ने चुनौती बढ़ा दी है।
दतिया में टिकट कटने से बढ़ा विवाद
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर बीजेपी ने पूर्व गृह मंत्री और तीन बार के विधायक नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद माना जा रहा था कि मिश्रा को उपचुनाव में मौका मिलेगा, लेकिन पार्टी ने युवा नेतृत्व पर दांव खेला।
इस फैसले के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने खुलकर विरोध किया। स्थिति ऐसी बनी कि पार्टी कार्यालय में पुलिस तक बुलानी पड़ी। हालांकि बाद में वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप से मामला शांत होता दिखाई दिया।
बांकीपुर में उम्मीदवार बदलने पर विपक्ष हमलावर
बिहार की बांकीपुर सीट नितिन नवीन की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़ी मानी जा रही है। उनके राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार ‘बंटी’ को उम्मीदवार बनाया, लेकिन बाद में उनकी जगह नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दे दिया।
उम्मीदवार बदलने के इस फैसले पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। अभिषेक बंटी का नाम उनके पिता से जुड़े पुराने मामलों को लेकर चर्चा में रहा, जबकि नीरज सिन्हा की जन्मतिथि और एक वायरल वीडियो को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
बांकीपुर में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
बांकीपुर सीट पर मुकाबला बेहद रोचक माना जा रहा है। यहां बीजेपी उम्मीदवार के सामने आरजेडी की रेखा गुप्ता और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी चुनावी मैदान में हैं। ऐसे में यह सीट केवल चुनावी जीत ही नहीं, बल्कि बीजेपी के संगठन और नेतृत्व की रणनीति की भी परीक्षा मानी जा रही है
बांकीपुर और दतिया, दोनों उपचुनावों में बीजेपी के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां हैं। दतिया में वरिष्ठ नेता के समर्थकों की नाराजगी को संभालना बड़ी चुनौती है, जबकि बांकीपुर में विपक्ष के हमलों और मजबूत चुनावी मुकाबले के बीच पार्टी को अपनी पारंपरिक बढ़त बनाए रखनी होगी।
उम्मीदवार चयन को लेकर उठे सवालों और डैमेज कंट्रोल की कोशिशों के बीच अब सबकी नजर चुनाव प्रचार और मतदान पर है। इन दोनों उपचुनावों के नतीजे न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि बीजेपी के नए राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति और संगठनात्मक क्षमता की भी महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकते हैं।

