जून में खुदरा महंगाई 4.38% पर पहुंची, रेपो रेट में कटौती की उम्मीदों को झटका

देश में खुदरा महंगाई दर एक बार फिर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है। जून 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि मई में यह 3.93 प्रतिशत थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी के कारण हुई है, जिससे रेपो रेट में कटौती की संभावनाओं पर फिलहाल विराम लगने के संकेत मिल रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून में खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गई, जो मई में 4.78 प्रतिशत थी। चांदी, सोना, हीरा एवं प्लेटिनम के आभूषण, अदरक, टमाटर और किशमिश जैसी वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इसी वर्ष जनवरी से लागू नई सीपीआई श्रृंखला का आधार वर्ष 2024 रखा गया है और पहली बार इस नई श्रृंखला में खुदरा महंगाई 4 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंची है।
आरबीआई को सरकार की ओर से महंगाई को 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है, जिसमें 2 प्रतिशत ऊपर या नीचे का सहनशीलता दायरा निर्धारित है। ऐसे में महंगाई का लक्ष्य से ऊपर जाना केंद्रीय बैंक के लिए चुनौती बन गया है। यदि महंगाई लगातार ऊंची बनी रहती है तो रेपो रेट में कटौती की संभावना और कम हो सकती है। हालांकि ब्याज दर बढ़ाने से कर्ज महंगा होने और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने का जोखिम भी बना रहेगा।
महंगाई के मौजूदा स्तर का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। फिलहाल होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई में राहत मिलने की संभावना कम नजर आ रही है। यदि आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ती है तो बैंकों की ब्याज दरों में भी वृद्धि हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करने वाले लोगों को ऊंची ब्याज दरों का लाभ मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई फिलहाल जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला लेने के बजाय स्थिति पर नजर बनाए रख सकता है। उनका कहना है कि महंगाई में हालिया बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं की कीमतों और आपूर्ति संबंधी कारणों से हुई है, जबकि मांग आधारित दबाव अभी सीमित है। ऐसे में केंद्रीय बैंक आगामी मौद्रिक नीति बैठक में ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति अपनाते हुए रेपो रेट को यथावत रख सकता है।
अर्थशास्त्रियों का यह भी मानना है कि आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों और मानसून की स्थिति पर विशेष नजर रहेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है या खरीफ फसल प्रभावित होती है तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। ऐसे में आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति बैठक पर बाजार और आम लोगों की नजरें टिकी रहेंगी।

