हल्द्वानी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल मलिक की जमानत रखी बरकरार, UAPA लगाने पर उत्तराखंड सरकार से पूछे सख्त सवाल

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा हिंसा मामले के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत बरकरार रखते हुए उत्तराखंड सरकार की याचिका खारिज कर दी। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) लगाए जाने पर भी गंभीर सवाल उठाए।
UAPA लगाने पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कोई भीड़ पुलिस थाने में आग लगा देती है, तो सिर्फ इसी आधार पर UAPA कैसे लगाया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और UAPA के तहत आतंकवाद से जुड़े अपराध अलग-अलग अवधारणाएं हैं और दोनों को एक समान नहीं माना जा सकता।
जमानत आदेश में दखल से किया इनकार
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि भले ही हाई कोर्ट के आदेश में विस्तृत कारण न हों, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने किन आधारों पर दी थी जमानत?
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 16 अप्रैल 2026 को अब्दुल मलिक को जमानत दी थी। अदालत ने कहा था कि जांच के अनुसार घटना के समय मलिक घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। साथ ही उसके बेटे अब्दुल मोईद सहित एक अन्य सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
मलिक पर 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में हुई हिंसा के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC), UAPA, आर्म्स एक्ट और अन्य कानूनों के तहत कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज है।
उत्तराखंड सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने दलील दी कि अब्दुल मलिक हिंसा का मुख्य साजिशकर्ता था और केवल घटनास्थल पर मौजूद न होना उसे राहत देने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत से जुड़ी कड़ी कानूनी शर्तों पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और हाई कोर्ट के जमानत आदेश को बरकरार रखा।



