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World War की बमबारी झेलने वाला हावड़ा ब्रिज 5 रूपए के गुटके के सामने लाचार

इतिहास के पन्नों को पलटिए तो एक ऐसी फौलादी संरचना सामने आती है, जिसने न सिर्फ वक्त के थपेड़ों को सहा, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के दौरान जापानी लड़ाकू विमानों की भीषण बमबारी को भी हंसकर झेल लिया। हम बात कर रहे हैं कोलकाता की पहचान और देश की ऐतिहासिक धरोहर ‘हावड़ा ब्रिज’ (रवीन्द्र सेतु) की। लेकिन आज इस महान इंजीनियरिंग के शाहकार को किसी दुश्मन देश के बम-बारूद से खतरा नहीं है। इसे खतरा है हमारी और आपकी जेब में मिलने वाले महज 5 रुपये के गुटके और पान-मसाले से!

सुनने में यह बात अजीब, हास्यास्पद या किसी अफवाह जैसी लग सकती है, लेकिन यह कड़वी हकीकत शत-प्रतिशत सच है। कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट की एक आधिकारिक और चौंकाने वाली वैज्ञानिक जांच में सामने आया है कि जो पुल बम धमाकों से नहीं हिला, वो आज इंसानी थूक यानी ‘गुटके की पीक’ के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो गया है। पुल को थामने वाले फौलाद को गुटके के तेजाब ने आधा गला दिया है।

World War : 6mm से घटकर 3mm रह गई फौलादी प्लेटें

हावड़ा और कोलकाता को जोड़ने वाला यह सस्पेंशन-टाइप बैलेंस्ड कैंटिलीवर ब्रिज बिना किसी खंभे के सिर्फ नदी के दोनों किनारों पर बने पायों पर टिका हुआ है। इसके मुख्य पायों की सुरक्षा के लिए नीचे स्टील के भारी-भरकम ‘हैंड्रेल्स’ और 6 मिलीमीटर मोटी सुरक्षात्मक स्टील की प्लेटें (Steel Hanger Base Covers) लगाई गई थीं।

लेकिन हाल के वर्षों में जब विशेषज्ञों और इंजीनियरों ने इसकी सेहत का जायजा लिया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। राहगीरों द्वारा लगातार थूके जाने के कारण इन फौलादी प्लेटों की मोटाई 6 मिलीमीटर से घटकर मात्र 3 मिलीमीटर रह गई है। यानी इस ऐतिहासिक पुल की सुरक्षा कवच की ताकत आधी हो चुकी है।

World War: लोहे को चाट रहा है ‘अदृश्य तेजाब’

आखिर थूक में ऐसा क्या है जो फौलाद को भी मिट्टी बना रहा है? वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह कोई सामान्य थूक नहीं बल्कि एक खतरनाक रासायनिक हमला है। गुटके, खैनी और पान-मसाले में भारी मात्रा में चूना (Calcium Hydroxide), कत्था और कई तरह के संक्षारक (Corrosive) केमिकल्स होते हैं।

जब कोई व्यक्ति गुटका चबाकर पुल के स्टील के हिस्सों पर थूकता है, तो यह मिश्रण हवा की नमी और इंसानी लार के साथ मिलकर एक बेहद खतरनाक एसिडिक (अम्लीय) और केमिकल रिएक्शन शुरू कर देता है। यह केमिकल रिएक्शन स्टील और लोहे की परतों को धीरे-धीरे ‘संक्षारित’ (Corrode) यानी गलाना शुरू कर देता है। लंबे समय तक लगातार थूके जाने के कारण यह प्रक्रिया एक अदृश्य तेजाब की तरह काम करती है, जो धीरे-धीरे फौलाद को खा जाती है।

‘फाइबरग्लास’ का अनोखा कवच

इस राष्ट्रीय धरोहर को ढहने से बचाने के लिए कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट (Syama Prasad Mookerjee Port) को आपातकालीन कदम उठाने पड़े। पुल के आधार को बचाने के लिए इंजीनियरों ने एक अनोखा तरीका निकाला। जिन स्टील के पायों पर सबसे ज्यादा थूका जाता था, उन्हें नीचे से लगभग 3 से 4 फीट की ऊंचाई तक ‘फाइबरग्लास’ (Fiberglass Covers) की विशेष शीटों से ढक दिया गया है।

ताकि अगर लोग थूकें भी, तो वह सीधे स्टील की प्लेटों पर न लगकर फाइबरग्लास पर गिरे। इसके अलावा, इन पायों को बार-बार साफ करने और केमिकल हटाने के लिए प्रशासन को हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने पड़ रहे हैं। साफ-सफाई के लिए विशेष जेट स्प्रे और आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाता है, जिसका पूरा बोझ टैक्सपेयर्स की जेब पर आता है।

World War : रोज गुजरते हैं लाखों वाहन

हावड़ा ब्रिज सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह कोलकाता की लाइफलाइन है। इस पुल से रोजाना 1 लाख से अधिक गाड़ियां और लाखों पैदल यात्री गुजरते हैं। यदि हमारी इस गंदी आदत की वजह से पुल के मुख्य ढांचे या उसके बेस को कोई बड़ा नुकसान पहुंचता है, तो यह सिर्फ एक आर्थिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि एक बहुत बड़े मानवीय हादसे को निमंत्रण देना होगा।

प्रशासन ने पुल पर थूकने वालों के खिलाफ जुर्माने और कड़ी कार्रवाई के बोर्ड भी लगाए हैं, सीसीटीवी कैमरों से निगरानी भी की जाती है, लेकिन जब तक नागरिक खुद जागरूक नहीं होंगे, तब तक किसी भी तकनीक से इस ऐतिहासिक धरोहर को नहीं बचाया जा सकता।

World War : विरासत को कूड़ेदान बनाना कब बंद करेंगे हम?

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह दावा पूरी तरह आंखें खोलने वाला है। यह खबर हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि हमारी एक छोटी सी, गैर-जिम्मेदाराना आदत देश की कितनी बड़ी संपत्ति को मटियामेट कर रही है। जिस पुल ने इतिहास बनते देखा, जो भारत की इंजीनियरिंग का गौरव है, उसे ‘लाल थूक’ के कलंक से बचाना बेहद जरूरी है। सार्वजनिक संपत्तियों को कूड़ेदान समझना बंद करना होगा और अपनी इस अनमोल विरासत का सम्मान करना होगा, अन्यथा आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

(यह रिपोर्ट पूरी तरह प्रमाणित तथ्यों और कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सुरक्षा आंकड़ों पर आधारित है।)

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