
BIG TRUTH : अपनी धरती, अपने खान—पान पर गर्व होना चाहिए। अपने देश का जितना हो सके मान बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए। और यही हर भारतीय के संस्कार भी हैं। लेकिन अपने ही देश के लोग, जब अपने स्वार्थ के लिए, अपने ही देश के लोगों को जहर परोसने लग जाएं, विदेशी धरती के लोग घटिया मानक कहते हुए, खाद्यान्न लेने से इंकार कर दें, क्या तब भी गुणगान ही करते रहना जायज है? वास्तव में यह एक ऐसा सवाल है, जिसके पीछे की हकीकत हर किसी को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर देगा। हम जिन फलों, अनाज, दाल और मसालों को खुद खा रहे हैं, अपनों को यह सोचकर खिला रहे हैं कि उनकी सेहत अच्छी होगी, तो यह केवल हमारा भ्रम है।
गर्मियों के मौसम में जिस भारतीय ‘हापुस’ (अल्फांसो), केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली आम की भीनी-भीनी खुशबू से देश की मंडियां महक उठती हैं, वही खुशबू इस बार अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिखरने से पहले ही दम तोड़ रही है। सोशल मीडिया पर हाल ही में वायरल हुई एक स्तब्ध करने वाली जानकारी ने देश के नीति-निर्माताओं और कृषि निर्यातकों के कान खड़े कर दिए हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय आमों की कुछ खेपों में खामियां निकालने के ठीक बाद, अब तकनीक और गुणवत्ता के मामले में दुनिया के सबसे सख्त देशों में शुमार जापान ने भारतीय आमों के आयात पर अंतरिम रोक (सस्पेंशन) लगा दी है।
यह झटका इसलिए भी अधिक गहरा और परेशान करने वाला है क्योंकि जापान ने करीब दो दशक (20 वर्ष) के लंबे प्रतिबंध के बाद साल 2006 में भारतीय आमों के लिए अपने दरवाजे खोले थे। पूरे बीस साल की कूटनीतिक और वैज्ञानिक जद्दोजहद के बाद मिली यह कामयाबी, प्रशासनिक लापरवाही और ट्रीटमेंट सेंटर्स की तकनीकी कमियों के कारण एक झटके में फिर से दांव पर लग गई है।
लेकिन कहानी सिर्फ आम के ‘खट्टे’ होने तक सीमित नहीं है। अगर हम वैश्विक खाद्य सुरक्षा रिपोर्टों के पन्ने पलटें, तो यह कड़वा सच सामने आता है कि विदेशी धरती से सिर्फ आम ही नहीं, बल्कि भारतीय मसाले, बासमती चावल, चायपत्ती, मूंगफली और हर्बल सप्लीमेंट्स भी लगातार वापस भेजे जा रहे हैं या उन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। आइए इस पूरे संकट की तह में जाते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक, भारत को वैश्विक मंच पर यह ‘मुंह की’ क्यों खानी पड़ रही है।
BIG TRUTH : जापान में क्या हुआ?
जापान अपनी खाद्य सुरक्षा और ‘फाइटोसैनिटरी’ (Phytosanitary – पादप स्वच्छता) मानकों को लेकर बेहद कड़ा रुख रखता है। किसी भी फल को अपने देश में प्रवेश देने से पहले जापान यह सुनिश्चित करता है कि उसमें किसी भी प्रकार के हानिकारक कीट या उनके अंडे न हों। इसके लिए भारतीय आमों को निर्यात से पहले ‘वेपर हीट ट्रीटमेंट’ (VHT – वाष्प ऊष्मा उपचार) और सख्त धूमीकरण (Fumigation) प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। यह एक ऐसी रासायनिक-मुक्त प्रक्रिया है जिसमें नियंत्रित गर्म और आर्द्र हवा के जरिए आम के भीतर छिपे ‘फ्रूट फ्लाई’ (फल मक्खी) के अंडों और लार्वा को नष्ट किया जाता है।
जापान के ‘योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन’ के अधिकारियों ने इस सीजन की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के रहमानपुर और नवी मुंबई के वाशी स्थित ट्रीटमेंट फैसिलिटीज़ (उपचार केंद्रों) का औचक निरीक्षण किया था। इस जांच में जापानी निरीक्षकों को पेस्ट-कंट्रोल और डिसइंफेक्शन (कीटाणुशोधन) की प्रक्रियाओं में गंभीर तकनीकी खामियां और लापरवाही मिलीं। नतीजतन, जापानी अधिकारियों ने एक कड़ा नोटिस जारी करते हुए 25 मार्च, 2026 के बाद प्रमाणित की गई भारतीय आमों की सभी खेपों को लेने से साफ इंकार कर दिया।
जापान का तर्क सीधा है: यदि भारत अपने ही सेंटर्स पर गुणवत्ता मानकों का सही ढंग से पालन नहीं कर सकता, तो वे अपने घरेलू कृषि तंत्र को ‘फ्रूट फ्लाई’ जैसी विनाशकारी बीमारियों के जोखिम में नहीं डाल सकते। जब तक भारत इन संयंत्रों के संचालन मानकों में सुधार नहीं करता, तब तक यह निलंबन जारी रहेगा।
BIG TRUTH : मंडरा रहा है संकट
यदि आप सोचते हैं कि यह समस्या केवल आमों के एक या दो कंसाइनमेंट तक सीमित है, तो आप देश के निर्यात तंत्र की वास्तविक स्थिति से अनजान हैं। यूरोपीय संघ (EU), हांगकांग, सिंगापुर और अमेरिका की फूड सेफ्टी एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय खाद्य पदार्थों की अस्वीकृति (Rejection) की दर लगातार बढ़ रही है।
BIG TRUTH : मसालों में कैंसरकारी ‘एथिलीन ऑक्साइड’ का जिन्न:
भारतीय मसालों की साख पर सबसे बड़ा बट्टा तब लगा था जब हांगकांग और सिंगापुर ने भारत के नामी मसाला ब्रांड्स (MDH और एवरेस्ट) के कुछ मिक्स-मसालों में एथिलीन ऑक्साइड (Ethylene Oxide – EtO) की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई और उन पर प्रतिबंध लगा दिया। एथिलीन ऑक्साइड एक बेहद खतरनाक, रंगहीन गैस है जिसका उपयोग मुख्य रूप से चिकित्सा उपकरणों को स्टरलाइज करने के लिए किया जाता है। भारतीय प्रोसेसर इसका उपयोग मसालों में माइक्रो-ऑर्गेनिज्म (सूक्ष्मजीवों) और फंगस को मारने के लिए धूमीकरण (Fumigation) के तौर पर करते हैं, क्योंकि यह भाप के जरिए स्टरलाइजेशन करने से बहुत सस्ता पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों (WHO) द्वारा इसे ‘कार्सिनोजेन’ (कैंसर पैदा करने वाला तत्व) घोषित किया गया है। यूरोपीय संघ ने तो 2020 से 2026 के बीच 500 से अधिक भारतीय खाद्य उत्पादों में इसकी मौजूदगी की पुष्टि की है।
BIG TRUTH : यूरोपीय संघ (EU) द्वारा 365 से अधिक उत्पादों की अस्वीकृति:
हाल ही में ‘यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण’ (EFSA) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पिछले दो वर्षों (मई 2024 से मई 2026) के भीतर यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने 365 से अधिक भारतीय खाद्य उत्पादों को रिजेक्ट किया है। इनमें जड़ी-बूटियां, मसाले, मेवे, बीज, बेकरी उत्पाद और आहार संबंधी पूरक (Dietetic Foods) शामिल थे।
BIG TRUTH : बासमती चावल में ‘ट्राइसाइक्लाजोल’ और ‘क्लोरपाइरीफॉस’:
भारत के गौरव कहे जाने वाले बासमती चावल की कई खेपें यूरोपीय देशों से इसलिए लौटाई गईं क्योंकि उनमें ‘ट्राइसाइक्लाजोल’ (Tricyclazole) नामक फंगसनाशक और ‘क्लोरपाइरीफॉस’ (Chlorpyrifos) नामक कीटनाशक की मात्रा ‘मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट’ (MRL) से कहीं ज्यादा थी। ट्राइसाइक्लाजोल यूरोपीय संघ में पूरी तरह प्रतिबंधित है, जबकि भारत के किसान इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं।
BIG TRUTH : माइक्रोबायोलॉजिकल और हेवी मेटल खतरा:
फूड लैब्स की जांच में पाया गया कि कई भारतीय खाद्य खेपों में ‘साल्मोनेला’ (Salmonella) और ‘एफ्लाटॉक्सिन’ (Aflatoxin) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया और फंगस मौजूद थे, जो खराब स्टोरेज और नमी के कारण पैदा होते हैं। इसके अलावा, कुछ हर्बल उत्पादों और चायपत्ती में सीसा (Lead), कैडमियम और पारे (Mercury) जैसे भारी तत्वों (Heavy Metals) की मिलावट या मौजूदगी पाई गई है, जो मानव शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
BIG TRUTH : आखिर वैश्विक मंच पर क्यों पिछड़ रहा है भारत?
सवाल उठता है कि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ‘ग्लोबल फूड बास्केट’ बनने की इच्छा रखने वाला भारत अंतरराष्ट्रीय मानकों की कसौटी पर बार-बार फेल क्यों हो रहा है? विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे चार मुख्य वजहें हैं:
- मानकों का दोहरा रवैया (Double Standards): भारत के घरेलू खाद्य नियामक (FSSAI) द्वारा तय कीटनाशकों की अधिकतम सीमा (MRL) और अंतरराष्ट्रीय नियामकों (जैसे EU या जापान के कोडेक्स एलीमेंटेरियस) के मानकों में जमीन-आसमान का अंतर है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ में किसी कीटनाशक की डिफ़ॉल्ट सीमा 0.01 ppm (पार्ट्स पर मिलियन) होती है, जबकि भारत में वही सीमा 0.5 से 2 ppm तक मान्य होती है। भारतीय निर्यातक अक्सर घरेलू मानकों के हिसाब से फसल तैयार करते हैं और विदेशों में वे फेल हो जाते हैं।
- सप्लाई चेन में व्यापक कमियां और जागरूकता का अभाव: भारत में खेत से लेकर शिपिंग पोर्ट तक की जो कड़ियां हैं, वे बेहद बिखरी हुई हैं। छोटे किसानों को इस बात की कोई जानकारी नहीं होती कि वे जो कीटनाशक छिड़क रहे हैं, उसका असर उनकी फसल के वैश्विक व्यापार पर क्या पड़ेगा। कटाई के बाद के प्रबंधन (Post-Harvest Management), कोल्ड स्टोरेज और परिवहन के दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखना कोड रेड का कारण बनता है।
- प्रमाणन और निरीक्षण में भ्रष्टाचार व ढिलाई: जापान द्वारा भारतीय आमों को बैन करने की मूल वजह यही है कि हमारे देश में मौजूद सरकारी स्वीकृत वीएचटी (VHT) और फाइटोसैनिटरी लैब्स ने अपनी जिम्मेदारी सही से नहीं निभाई। पेपर पर सब दुरुस्त दिखा दिया जाता है, लेकिन जब विदेशी टीमें ग्राउंड जीरो पर आकर जांच करती हैं, तो बुनियादी साफ-सफाई और प्रोटोकॉल गायब मिलते हैं।
- सस्ते विकल्पों की तलाश: भारतीय उत्पादक अक्सर महंगी और सुरक्षित तकनीकों (जैसे स्टीम स्टरलाइजेशन) की जगह शॉर्टकट और सस्ते रसायनों (जैसे एथिलीन ऑक्साइड गैस) का इस्तेमाल करते हैं, यह सोचकर कि शायद कोई पकड़ेगा नहीं। लेकिन आज की तारीख में वैश्विक स्तर पर ‘ट्रेसेबिलिटी’ (Traceability) और टेस्टिंग तकनीकें इतनी एडवांस हो चुकी हैं कि पीपीएम (ppm) स्तर की मिलावट भी तुरंत पकड़ में आ जाती है।
भविष्य की तरफ यह कैसा इशारा है?
यह संकट सिर्फ तात्कालिक आर्थिक नुकसान का नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक बेहद डरावना और चेतावनी भरा इशारा है:
- प्रतिद्वंद्वी देशों को खुला मैदान: जब जापान ने भारतीय आमों को रोका, तो उसने हाथ पर हाथ धरकर इंतजार नहीं किया। जापान ने तुरंत पाकिस्तान, वियतनाम, थाईलैंड, ताइवान और मैक्सिको जैसे देशों से आम आयात करना बढ़ा दिया। एक बार जब कोई प्रीमियम बाजार किसी दूसरे देश के हाथ में चला जाता है, तो उसे वापस पाना लोहे के चने चबाने जैसा होता है।
- ‘मेड इन इंडिया’ ब्रांड की साख पर बट्टा: अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह धारणा बन गई कि “भारतीय खाद्य उत्पाद असुरक्षित और रसायनों से भरे होते हैं”, तो इसका असर कपड़ा, आईटी या अन्य क्षेत्रों के निर्यात पर भी परोक्ष रूप से पड़ सकता है। विश्वसनीयता बनाने में दशकों लगते हैं, लेकिन उसे खोने में चंद दिन।
- किसानों पर दोहरी मार: निर्यात रुकने से घरेलू बाजार में माल का सरप्लस (अतिप्रवाह) हो जाता है, जिससे दाम औंधे मुंह गिर जाते हैं। पहले से ही जलवायु परिवर्तन और असमय हीटवेव (लू) की मार झेल रहे भारतीय आम और मसाला किसानों के लिए यह वित्तीय आत्महत्या जैसा परिदृश्य तैयार करता है।
अब ‘चलता है’ रवैया छोड़ना होगा
यदि भारत को वैश्विक कृषि व्यापार में अपनी धाक बनाए रखनी है, तो उसे ‘फूड डिप्लोमेसी’ और बुनियादी ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव करने होंगे:
- एकल कड़े मानक (Harmonized Standards): भारत सरकार को अपने घरेलू खाद्य सुरक्षा मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर (खासकर ईयू और यूएस मानकों) के समकक्ष लाना होगा। जो केमिकल विदेशों में प्रतिबंधित हैं, उन पर भारत में भी तत्काल और पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए।
- खेत से पोर्ट तक की ‘ट्रेसेबिलिटी’: डिजिटल तकनीकों (जैसे ब्लॉकचेन) के जरिए ‘फार्म-टू-फॉर्क’ ट्रैकिंग अनिवार्य की जाए। विदेशी खरीदार को पता होना चाहिए कि वह जो आम या मसाला खा रहा है, वह भारत के किस राज्य के, किस किसान के खेत में उगा है और उस पर कौन सा कीटनाशक छिड़का गया था।
- कड़ी जवाबदेही और ब्लैकलिस्टिंग: जिन ट्रीटमेंट फैसिलिटीज़ या लैब्स की लापरवाही के कारण देश का नाम खराब हुआ है, उन पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए और उन्हें हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
- किसानों की ट्रेनिंग: एपिडा (APEDA) और कृषि मंत्रालयों को जमीनी स्तर पर क्लस्टर बनाकर किसानों को ‘गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज’ (GAP) की ट्रेनिंग देनी होगी, ताकि वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से बच सकें।
गंभीर चेतावनी
जापान और अमेरिका द्वारा भारतीय आमों को लौटाया जाना एक गंभीर चेतावनी (Wake-up Call) है। यह इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक बाजार अब केवल स्वाद और मात्रा का दीवाना नहीं है; वह ‘सुरक्षा और शुद्धता’ को सर्वोपरि मानता है। भारत को यदि ‘विश्व गुरु’ और ‘वैश्विक व्यापार महाशक्ति’ बनना है, तो हमें अपनी ढीली कार्यसंस्कृति और ‘चलता है’ वाले रवैये को तुरंत तिलांजलि देनी होगी। अन्यथा, हमारी थाली का गौरव वैश्विक बाजारों के कूड़ेदान का हिस्सा बनता रहेगा, और भविष्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।

