देवघर और हरिद्वार कांवड़ यात्रा में क्यों दिखता है फर्क? जानिए क्या कहते हैं तथ्य

सावन में भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसी आस्था से जुड़ी दो प्रमुख कांवड़ यात्राएं हैं—हरिद्वार से गंगाजल लेकर उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर के श्रद्धालुओं की यात्रा तथा बिहार के सुल्तानगंज से झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक की यात्रा। हाल ही में आरजेडी सांसद मनोज झा ने इन दोनों यात्राओं की तुलना करते हुए कहा कि देवघर की कांवड़ यात्रा अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्ण और अनुशासित होती है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अक्सर विवाद और हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं।
हालांकि, केवल सामाजिक या राजनीतिक संस्कृति के आधार पर इस अंतर को समझना पर्याप्त नहीं है। दोनों यात्राओं के मार्ग, दूरी, भीड़, भौगोलिक परिस्थितियों और प्रशासनिक चुनौतियों में बड़ा अंतर है।
दोनों यात्राओं की पौराणिक मान्यता
मान्यता है कि भगवान परशुराम हरिद्वार से गंगाजल लाकर बागपत के पुरा महादेव में जलाभिषेक करने वाले पहले कांवड़िया थे। वहीं, रावण ने सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर में बाबा बैद्यनाथ का अभिषेक किया था। इसी कारण दोनों मार्गों पर कांवड़ यात्रा की परंपरा चली आ रही है।
रूट और दूरी का बड़ा अंतर
हरिद्वार कांवड़ यात्रा का मार्ग दिल्ली-एनसीआर, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, रुड़की होते हुए करीब 150 से 200 किलोमीटर तक फैला है। यह मार्ग घनी आबादी वाले शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों से गुजरता है।
वहीं, सुल्तानगंज से देवघर तक का कांवड़ मार्ग लगभग 105 किलोमीटर लंबा है। इसका अधिकांश हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों और विशेष रूप से कांवड़ियों के लिए बने पैदल मार्ग से होकर गुजरता है।
हरिद्वार मार्ग पर ज्यादा प्रशासनिक चुनौती
हरिद्वार रूट पर कांवड़ियों के साथ-साथ सामान्य यातायात भी चलता है। ऐसे में ट्रैफिक जाम, वाहन की टक्कर, कांवड़ छू जाने या जल गिरने जैसी छोटी घटनाएं भी विवाद का कारण बन जाती हैं।
इसके विपरीत देवघर मार्ग पर कांवड़ियों के लिए अलग पैदल रास्ता बनाया गया है, जहां वाहनों की आवाजाही नहीं होती। इससे स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच टकराव की संभावना काफी कम रहती है।
आबादी और भीड़ भी बड़ा कारण
दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका देश के सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में शामिल है। ऐसे में लाखों श्रद्धालुओं के साथ सामान्य जीवन भी प्रभावित होता है।
दूसरी ओर, देवघर का अधिकांश मार्ग ग्रामीण इलाकों से होकर गुजरता है, जहां आबादी का घनत्व कम है और भीड़ का दबाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है।
यात्रियों की संख्या में भी बड़ा अंतर
हरिद्वार कांवड़ यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है। 2025 में यह संख्या करीब 4.5 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान रहा, जबकि देवघर कांवड़ यात्रा में हर साल लगभग 50 लाख से 1 करोड़ श्रद्धालु शामिल होते हैं। अधिक संख्या होने से उत्तर प्रदेश में सुरक्षा और व्यवस्था की चुनौती भी कई गुना बढ़ जाती है।
डीजे और प्रदर्शन की संस्कृति
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कांवड़ यात्रा में बड़े डीजे, झांकियां और वाहनों का इस्तेमाल आम तौर पर देखा जाता है। कई बार तेज आवाज और प्रदर्शन की होड़ तनाव का कारण बनती है।
वहीं, देवघर की यात्रा पूरी तरह पैदल मार्ग पर आधारित है। यहां डीजे और बड़े वाहनों की परंपरा लगभग नहीं है, इसलिए यात्रा अपेक्षाकृत शांत रहती है।
मीडिया कवरेज का भी असर
हरिद्वार मार्ग दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़ा होने के कारण वहां की छोटी-बड़ी घटनाएं भी राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से दिखाई देती हैं। इसके विपरीत, देवघर मार्ग की घटनाएं अक्सर स्थानीय स्तर तक ही सीमित रह जाती हैं। इससे यह धारणा बन सकती है कि वहां कोई घटना होती ही नहीं, जबकि वास्तविकता अधिक जटिल हो सकती है।
हरिद्वार और देवघर की कांवड़ यात्राओं के स्वरूप में अंतर केवल सामाजिक या राजनीतिक कारणों से नहीं है। मार्ग की लंबाई, आबादी, यातायात, यात्रियों की संख्या, अलग पैदल मार्ग, ग्रामीण-शहरी परिवेश और प्रशासनिक चुनौतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए किसी एक कारण के आधार पर दोनों यात्राओं की तुलना करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। दोनों यात्राएं करोड़ों श्रद्धालुओं की गहरी आस्था से जुड़ी हैं और शांतिपूर्ण आयोजन के लिए श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रशासन की जिम्मेदारी भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।



