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9/11 के बाद कॉकपिट बना ‘किला’, फिर भी पायलट ने ही पायलट पर किया हमला; फ्लाईदुबई घटना ने उठाए विमान सुरक्षा पर सवाल

नई दिल्ली। 9/11 के बाद विमान के कॉकपिट की सुरक्षा को बेहद मजबूत किया गया, ताकि किसी बाहरी हमलावर को फ्लाइट डेक तक पहुंचने से रोका जा सके। लेकिन 30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में हुई घटना ने विमान सुरक्षा के एक अलग पहलू—‘इंसाइडर थ्रेट’ यानी विमान के अंदर मौजूद व्यक्ति से खतरे—पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दुबई से तेल अवीव जा रही बोइंग 737 में उड़ान के दौरान दोनों पायलटों के बीच हिंसक झड़प हुई। इजराइली अधिकारियों के अनुसार, को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर कथित तौर पर चाकू से हमला किया और विमान को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, घटना की परिस्थितियों और मकसद की अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी। फ्लाईदुबई ने भी कहा है कि फ्लाइट डेक में झड़प हुई और क्रू ने स्थिति को नियंत्रित कर विमान को सुरक्षित रूप से डायवर्ट किया।

34 हजार फीट से तेजी से नीचे आया विमान

फ्लाइट FZ1073 करीब 33-34 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रही थी, तभी अचानक विमान की ऊंचाई तेजी से कम होने लगी। फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार विमान ने लगभग 14 हजार फीट की ऊंचाई महज 30 सेकंड के आसपास में गंवा दी। इसके बाद विमान ने 7700, यानी सामान्य आपात स्थिति का संकेत भेजा।

कुछ मिनट बाद विमान से 7500 कोड भी प्रसारित हुआ, जिसका इस्तेमाल विमान में गैरकानूनी हस्तक्षेप या संभावित हाईजैकिंग की स्थिति में किया जाता है। विमान को अंततः सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा गया।

रिपोर्टों के मुताबिक, कैप्टन के घायल होने के बावजूद उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाबी हासिल की। इसके बाद यात्रियों और क्रू ने कथित हमलावर को काबू किया। विमान में मौजूद दो अन्य फ्लाईदुबई पायलटों ने विमान को संभालने में मदद की और उसे सुरक्षित उतारा गया। भारतीय दूतावास ने कैप्टन स्मित मच्छर के घायल होने की पुष्टि की है और बताया कि उनका इलाज तबूक के अस्पताल में चल रहा है।

9/11 के बाद कॉकपिट को इतना सुरक्षित क्यों बनाया गया?

11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों में अपहृत विमानों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद अमेरिका ने फ्लाइट डेक की सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए। FAA के अनुसार, जनवरी 2002 में नए मानक लागू किए गए, जिनके तहत यात्री विमानों के कॉकपिट दरवाजों को जबरन घुसपैठ और अन्य हमलों का सामना करने के लिए मजबूत किया गया।

इसका मकसद मुख्य रूप से बाहर से आने वाले हमलावरों को कॉकपिट तक पहुंचने से रोकना था। कॉकपिट का मजबूत और लॉक रहने वाला दरवाजा इसी सुरक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण परतों में से एक बन गया।

लेकिन फ्लाईदुबई की घटना ने दिखाया कि अगर खतरा कॉकपिट के अंदर मौजूद किसी व्यक्ति से हो, तो वही सुरक्षा व्यवस्था एक चुनौती भी बन सकती है।

जर्मनविंग्स हादसे ने भी दिखाई थी अलग कमजोरी

2015 में जर्मनविंग्स फ्लाइट 9525 हादसे के बाद विमानन सुरक्षा में एक अलग तरह के ‘इनसाइडर थ्रेट’ पर चर्चा शुरू हुई। उस मामले के बाद EASA ने अस्थायी रूप से सिफारिश की थी कि उड़ान के दौरान कॉकपिट में कम से कम दो अधिकृत लोग मौजूद रहें, जिनमें कम से कम एक योग्य पायलट हो।

बाद में EASA ने इस व्यवस्था को अधिक जोखिम-आधारित दृष्टिकोण के साथ संशोधित किया। इसमें मनोवैज्ञानिक और सुरक्षा जांच, कर्मचारियों की स्थिरता और अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखने की बात कही गई।

क्या पायलटों की जांच पर्याप्त है?

पायलटों की मेडिकल और सुरक्षा जांच विमानन सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन किसी भी जांच की एक सीमा होती है—वह किसी व्यक्ति की उस समय की स्थिति और उपलब्ध जानकारी का आकलन करती है। भविष्य में किसी व्यक्ति के व्यवहार या इरादे में होने वाले बदलाव को पूरी तरह पहले से पहचानना आसान नहीं है।

यही वजह है कि विमान सुरक्षा केवल पायलट की स्क्रीनिंग पर निर्भर नहीं करती, बल्कि कई स्तरों की सुरक्षा व्यवस्था पर आधारित होती है।

मजबूत कॉकपिट दरवाजा भी पूरी सुरक्षा नहीं

9/11 के बाद मजबूत किए गए कॉकपिट दरवाजे मुख्य रूप से बाहरी घुसपैठ रोकने के लिए हैं। इसके बावजूद दरवाजा कभी-कभी परिचालन कारणों से खोला जाना पड़ सकता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए अमेरिका ने 2023 में नए कमर्शियल विमानों में सेकेंडरी फ्लाइट-डेक बैरियर अनिवार्य किया। इसका उद्देश्य मुख्य कॉकपिट दरवाजा खुलने के दौरान भी अतिरिक्त सुरक्षा देना है।

ऑटोपायलट क्या पायलट की जगह ले सकता है?

ऑटोपायलट विमान को निर्धारित दिशा, ऊंचाई और गति बनाए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन यह पायलट के व्यवहार को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था नहीं है। किसी पायलट के हिंसक या जानबूझकर खतरनाक व्यवहार की स्थिति में विमान की सुरक्षा के लिए मानवीय प्रतिक्रिया और अन्य आपातकालीन व्यवस्थाएं अहम हो जाती हैं।

केबिन क्रू और ATC की क्या भूमिका होती है?

ऐसी आपात स्थिति में केबिन क्रू यात्रियों को सुरक्षित रखने, कॉकपिट से संपर्क करने और निर्धारित आपातकालीन प्रक्रियाओं का पालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं एयर ट्रैफिक कंट्रोल विमान को सुरक्षित एयरस्पेस उपलब्ध कराने, दूसरे विमानों को दूर रखने और आपात लैंडिंग के लिए सहायता प्रदान कर सकता है।

लेकिन ATC जमीन से विमान का सीधा नियंत्रण अपने हाथ में नहीं ले सकता। इसलिए कॉकपिट में मौजूद प्रशिक्षित क्रू अब भी विमान की सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण परतों में से एक रहता है।

फ्लाईदुबई घटना से कौन से सवाल सामने आए?

फ्लाईदुबई मामले की जांच अभी जारी है और घटना के पीछे का मकसद स्पष्ट नहीं हुआ है। UAE के अटॉर्नी जनरल ने जांच के आदेश दिए हैं, जिसमें घटना की परिस्थितियों, मकसद और संभावित अन्य पहलुओं की जांच की जा रही है। फ्लाईदुबई ने भी जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने की अपील की है।

जांच में कई अहम सवालों पर ध्यान दिया जा सकता है—कॉकपिट में कथित हथियार कैसे पहुंचा, क्रू सुरक्षा प्रक्रियाएं कैसे लागू हुईं, घायल कैप्टन ने कॉकपिट तक यात्रियों की पहुंच कैसे संभव बनाई और विमान में मौजूद अतिरिक्त पायलटों ने किस तरह नियंत्रण संभाला।

इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि आधुनिक विमान सुरक्षा में सिर्फ ‘कॉकपिट को बाहर से सुरक्षित रखना’ पर्याप्त नहीं है। बाहरी घुसपैठ, अंदरूनी खतरे, क्रू स्क्रीनिंग, आपातकालीन प्रक्रियाएं और तकनीकी सुरक्षा—इन सभी परतों को साथ लेकर ही विमानन सुरक्षा का पूरा ढांचा तैयार होता है।

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