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Chhattisgarh

खैरागढ़ में करोड़ों की जमीन का खेल! सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और जंगल, फिर कैसे बिक गए प्लॉट?

खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में सरकारी जमीनों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है। जिन जमीनों को सरकारी रिकॉर्ड में पार्क, छोटे झाड़ का जंगल और सार्वजनिक उपयोग की भूमि बताया गया था, उन्हें प्लॉट में बदलकर करोड़ों रुपये में बेचे जाने का खुलासा हुआ है। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद राजस्व व्यवस्था और वर्षों से चली आ रही रजिस्ट्रियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

किन जमीनों पर उठे सवाल?

पूरा मामला खैरागढ़ के खसरा नंबर 114, 115, 169 और 170 से जुड़ा हुआ है। संयुक्त जांच प्रतिवेदन में इन जमीनों के स्वरूप और उनके उपयोग को लेकर गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भूमि के बावजूद बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-बिक्री की गई।

हजारों से लाखों तक पहुंची जमीन की कीमत

सूत्रों के अनुसार, जमीन के कुछ हिस्से पहले दो से तीन हजार रुपये प्रति वर्गफीट की दर से बेचे गए। बाद में बिचौलियों की एंट्री के बाद यही जमीन सात से आठ हजार रुपये प्रति वर्गफीट तक पहुंच गई। देखते ही देखते करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा हो गया।

मेंटेनेंस खसरे से शुरू हुआ खेल?

जानकारी के मुताबिक, रियासतकालीन रिकॉर्ड तैयार करते समय कई जमीनों को सरकारी, सार्वजनिक उपयोग या जंगल मद में दर्ज किया गया था। हालांकि मेंटेनेंस खसरे के स्वामित्व कॉलम में तत्कालीन राजपरिवार के नाम दर्ज रहे। समय के साथ इन्हीं प्रविष्टियों को मालिकाना हक का आधार मान लिया गया और जमीनों की खरीदी-बिक्री शुरू हो गई।

कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल मेंटेनेंस खसरे में नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति के पूर्ण स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कई न्यायिक टिप्पणियों में भी स्पष्ट किया गया है कि राजस्व रिकॉर्ड अंतिम मालिकाना हक का प्रमाण नहीं होता।

बिना स्वीकृत ले-आउट के हुए प्लॉट

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने भी जांच के दौरान स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि का कोई स्वीकृत ले-आउट नहीं था। रिपोर्ट में बिना अनुमति भूमि विभाजन और उपविभाजन किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद रजिस्ट्रियां हुईं, मकान बने और जमीन का कारोबार लगातार चलता रहा।

अब सिस्टम पर उठ रहे सवाल

मामले के सामने आने के बाद लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि जब छोटी-छोटी जमीनों पर नियमों का हवाला देकर निर्माण रोक दिया जाता है, तो करोड़ों रुपये की इन जमीनों पर वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। सवाल यह भी उठ रहा है कि रजिस्ट्री, नामांतरण और निर्माण की अनुमति आखिर किस आधार पर दी गई।

राजस्व मंत्री ने मांगी पूरी रिपोर्ट

मामला अब शासन स्तर तक पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा है कि शिकायत और जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए। यदि जांच में अनियमितताएं पाई गई हैं तो यह भी देखा जाएगा कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। पूरे मामले की समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

जांच के बाद खुल सकते हैं कई राज

राजस्व मंत्री के बयान के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है। माना जा रहा है कि यदि जांच गहराई से हुई तो इसकी आंच केवल जमीन बेचने वालों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन विभागों और अधिकारियों तक भी पहुंच सकती है, जहां से रजिस्ट्री, नामांतरण और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े काम होते हैं।

अब खैरागढ़ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जमीन सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और जंगल के रूप में दर्ज थी, तो करोड़ों रुपये के प्लॉट आखिर किस आधार पर बिकते रहे? और यदि सब कुछ वैध था, तो फिर जांच की जरूरत क्यों पड़ी? इन सवालों के जवाब ही पूरे मामले की सच्चाई सामने लाएंगे।

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