कोलकाता में सड़क के नाम को लेकर नया विवाद, बीजेपी और टीएमसी आमने-सामने

कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड किए जाने के फैसले पर बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच नया राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है।
क्या है मामला?
कोलकाता नगर निगम ने हाल ही में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड रखने का फैसला किया। इस पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने नगर निगम की सराहना करते हुए कहा कि गोपाल मुखर्जी ने 1946 के Great Calcutta Killings के दौरान हिंदुओं की रक्षा की थी और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए।
टीएमसी ने उठाया सवाल
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि जिस सड़क का नाम बदला गया है, वह डॉ. सर हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी, न कि हुसैन शाहिद सुहरावर्दी के नाम पर।
उनके अनुसार:
- डॉ. सर हसन सुहरावर्दी कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रसिद्ध चिकित्सक थे।
- वे 1930 से 1934 तक विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर रहे।
- सड़क का नाम 1933 में उनके सम्मान में रखा गया था।
- उनका संबंध 1946 के दंगों से नहीं था।
चाचा-भतीजे के नाम को लेकर भ्रम
कुणाल घोष ने कहा कि:
- डॉ. सर हसन सुहरावर्दी और
- हुसैन शाहिद सुहरावर्दी
दो अलग-अलग व्यक्ति थे, हालांकि दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजे थे।
हुसैन शाहिद सुहरावर्दी 1946 में बंगाल के प्रधानमंत्री थे और उन पर ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स के दौरान प्रशासनिक विफलता तथा हिंसा को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।
1933 की अधिसूचना का हवाला
टीएमसी ने 1933 की कोलकाता नगर निगम की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि सड़क का नाम स्पष्ट रूप से सर हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, क्योंकि उनका निवास उसी क्षेत्र में था।
गोपाल मुखर्जी कौन थे?
गोपाल मुखर्जी, जिन्हें गोपाल पाठा के नाम से भी जाना जाता है, 1946 के दंगों के दौरान हिंदू समुदाय की रक्षा के लिए जाने जाते हैं। इतिहास में उन्हें उन लोगों में गिना जाता है जिन्होंने दंगों के समय स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध खड़ा किया था।

विवाद की जड़
विवाद इस बात को लेकर है कि सड़क का मूल नाम किस सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था।
- बीजेपी का कहना है कि यह नाम एक विवादित ऐतिहासिक व्यक्तित्व से जुड़ा था, इसलिए बदलाव उचित है।
- टीएमसी का दावा है कि सड़क का नाम एक सम्मानित शिक्षाविद और चिकित्सक के नाम पर था, इसलिए नाम बदलने का आधार गलत है।
यही वजह है कि सड़क का नाम बदलने का फैसला अब इतिहास और राजनीति दोनों का विषय बन गया है।

