पूर्व जस्टिस कुरियन जोसेफ ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल, नियुक्ति और बर्खास्तगी के नियम बदलने की मांग

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भारतीय चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक संशोधन की मांग की है। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा सेवा की शर्तें संविधान में निर्धारित होनी चाहिए। साथ ही, सभी चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने की प्रक्रिया भी समान होनी चाहिए। उनका यह बयान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच आया है।
नियुक्ति प्रक्रिया में संवैधानिक सुरक्षा की मांग
जस्टिस कुरियन जोसेफ ने केरल में आयोजित एक संगोष्ठी में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने संविधान सभा की बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियुक्ति की प्रक्रिया से ही पर्याप्त संवैधानिक सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324 का जिक्र करते हुए कहा कि यह चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और चुनावों की देखरेख, निर्देशन तथा नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है। ऐसे में इस संस्था की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए भी मजबूत प्रावधान जरूरी हैं। उनके मुताबिक, नियुक्ति और सेवा की शर्तों को केवल संसदीय कानून पर छोड़ने के बजाय संविधान में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
ईमानदारी पर सवाल उठने से लोकतंत्र को खतरा
जस्टिस जोसेफ ने संविधान सभा के सदस्य डॉ. हृदय नाथ कुंजरू की चेतावनी का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि चुनाव कराने वाली व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों की ईमानदारी पर भरोसा नहीं रह जाता, तो इससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो सकती है। उन्होंने कहा कि देश को लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
उन्होंने संविधान सभा की बहसों में डॉ. बीआर आंबेडकर की ओर से उठाई गई चिंताओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग में ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए, जिन पर सरकार के प्रभाव में काम करने की आशंका हो।
सभी चुनाव आयुक्तों को समान सुरक्षा देने की मांग
जस्टिस जोसेफ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने की प्रक्रिया में अंतर पर भी सवाल उठाया। वर्तमान व्यवस्था में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।
उन्होंने मांग की कि सभी चुनाव आयुक्तों को समान संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए और उन्हें पद से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों जैसी प्रक्रिया लागू होनी चाहिए। उनका कहना था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य आयुक्तों से अलग विशेष दर्जा नहीं मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक शक्तियां किसी व्यक्ति का निजी विशेषाधिकार नहीं, बल्कि संस्था की जिम्मेदारी होती हैं। इसलिए इन शक्तियों का इस्तेमाल निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए।



