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करीब 100 उम्रकैद बंदी, स्वतंत्रता दिवस तक होंगे रिहा

प्रदेश के जेलों में नक्सल मामलों में बंद सैकड़ों आदिवासियों को है रिहाई का इंतजार

इस बार भी गत वर्षों के भांति अच्छे चाल-चलन और जेल में उनके बर्ताव प्रकृति में सुधार को देखते हुए छत्तीसगढ़ में कुछेक कैदियों यो रिहाई मिली है। भारत के 80 वें स्वतंत्रता दिवस के मौके को ध्यान में रखते हुए कुछेक और लोगों को सरकार रिहा कर सकती है। फिलहाल जो सूचना मिल रही है उसके मुताबिक राज्य के पांचों संभागों की जेलों से लगभग 94 से 101 कैदियों को उनके अच्छे चाल-चलन और जेल में उनके बर्ताव प्रकृति में सुधार को देखते हुए रिहा किया जा सकता है। ये सभी रिहा होने वाले कैदी इन जेलों में उम्रकैद की सजा काट रहें हैं। अब जबकि प्रदेश में नक्सलवाद समाप्त हो गया है ऐसे में सरकार नक्सल मामलों में बंद कम गंभीर अपराधों के मामले में आरोपी बनाए गए निर्दोष और गरीब आदिवासी जिनकी संख्या में सैकड़ों में है उन्हें भी रिहा कर देती।

इस बार 15 अगस्त से पहले रायपुर सेन्ट्रल जेल से 1 महिला समेत 9 कैदियों का रिहा किया गया है। सभी जेल बंदी पर हत्या के केस में जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे थे। बताया जा रहा है कि 15 अगस्त 12 और उम्र कैद सजायाफ्ता बंदियों को छोड़ा जा सकता है। जेल से रिहा होते इन सभी बंदियों के हाथ में जीने की राह बताने वाली धार्मिक ग्रंथ गीता हाथ में थी और वे लोग आगे की जिंदगी प्रेम से शांति से बिताना चाह रहे थे। ये एक अच्छी बात है। लेकिन इस रिहाई का एक और पहलू है जिस पर अब सरकार को बात करनी चाहिए। वह है नक्सल मामला। नक्सल गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में छत्तीसगढ़ राज्य की विभिन्न जेलों में कुल 5,239 आदिवासी बंद हैं। इनमें अधिकांस पर UAPA या छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसी धाराएं लगी है। प्रदेश भर की जेलों में अलग-अलग अपराधों में बंद कुल 16,475 आदिवासी बंद हैं।

अगर बात करें नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों कि तो अधिकतर ये वो निर्धन और निरक्षर आदिवासी हैं जो चाहकर भी अपने लिए ढ़ंग का वकील नहीं कर सकते हैं। जिसके कारण वे लगातार उस सजा को भोग रहें हैं जिसके बारें में कोर्ट ने उन्हें सजा नहीं सुनाई। कई लोगों को आज भी ट्रायल का इंतजार है। अब ऐसे में जब सरकार घोषणा कर चुकी है कि प्रदेश नक्सलवाद से मुक्त हो गया और कई दुर्दांत नक्सली लीडरों को आम माफी मिल चुकी है तो इन्हें भी माफ कर दिया जाना चाहिए।

हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने कम गंभीर नक्सल मामलों में बंद कैदियों के मामलों की कानूनी समीक्षा के आदेश दिए हैं। वहीं पर उनके परिजन बस्तर और अन्य प्रभावित क्षेत्रों के आदिवासी जनप्रतिनिधियों से जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों के रिहाई की मांग लगातार उठा रहें हैं। ऐसे में जब सरकार पुनर्वास और आत्मसमर्पण करने वाले और कम गंभीर आरोपों मामलों में फंसे लोगों के मामलों को वापस लेने तथा उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया पर जोर दे रही तो धरातल में भी इस प्रकार के मामलों में तेजी दिखनी चाहिए।

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Avdhesh Mallick

​Bilingual senior journalist and media strategist with over 13 years of experience across TV, print, and digital media. Skilled in beat reporting (Politics, Environment, Naxal/Tribal issues, Industry, Agriculture), editorial leadership, digital marketing, and strategic media consultancy. Frequently featured as an expert analyst on prime-time TV news debates. Recently served as news editor @fpj

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