अमेरिका में जून में सिर्फ 57 हजार नई नौकरियां, कमजोर जॉब मार्केट ने बढ़ाई अर्थव्यवस्था की चिंता

अमेरिका में जून 2026 के दौरान रोजगार सृजन की रफ्तार उम्मीद से काफी कमजोर रही। अमेरिकी श्रम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून में देश में केवल 57 हजार नई नौकरियां जुड़ीं, जो बाजार के अनुमान और पिछले महीने के मुकाबले काफी कम हैं। कमजोर रोजगार आंकड़ों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार और भविष्य की वृद्धि को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऊंची महंगाई, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और व्यापारिक तनाव के कारण कंपनियां नई भर्तियों को लेकर सतर्क हो गई हैं। बढ़ती लागत और भविष्य की मांग को लेकर अनिश्चितता के चलते कई कंपनियां निवेश और हायरिंग दोनों में कटौती कर रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक जून में अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.3 प्रतिशत से घटकर 4.2 प्रतिशत हो गई। हालांकि यह आंकड़ा सकारात्मक दिखता है, लेकिन इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बड़ी संख्या में लोगों ने नौकरी की तलाश ही छोड़ दी। ऐसे लोगों को आधिकारिक बेरोजगारी दर में शामिल नहीं किया जाता, जिससे बेरोजगारी दर वास्तविक स्थिति से बेहतर दिखाई दे सकती है।
इसी का असर लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट पर भी दिखा। काम कर रहे या नौकरी की तलाश कर रहे लोगों का अनुपात घटकर 61.5 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वहीं 25 से 54 वर्ष आयु वर्ग की पार्टिसिपेशन रेट भी घटकर 83.3 प्रतिशत रह गई, जो श्रम बाजार में घटती भागीदारी का संकेत है।
रोजगार के मोर्चे पर मिश्रित तस्वीर देखने को मिली। डेटा सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के चलते निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कुछ नई नौकरियां बनीं, लेकिन टेक सेक्टर में छंटनी का सिलसिला जारी रहा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में बढ़ते निवेश के बीच कई बड़ी टेक कंपनियां लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं। सूचना एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में पिछले 18 महीनों के दौरान 17वीं बार रोजगार में गिरावट दर्ज की गई।
कमजोर रोजगार आंकड़ों ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। यदि आर्थिक गतिविधियां और धीमी पड़ती हैं, तो ब्याज दरों को लेकर फेड पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि औसत वेतन में सालाना आधार पर 3.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वेतन वृद्धि से श्रम बाजार की मौजूदा कमजोरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

