छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुजुर्गों के अधिकारों पर अहम फैसला सुनाया
जरूरत पड़ने पर बेटे को घर से बेदखल कर सकता है ट्रिब्यूनल

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट(High Court) ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई बेटा या अन्य परिजन बुजुर्ग माता-पिता के शांतिपूर्ण और सम्मानजनक जीवन में बाधा बनता है, तो मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल उसे घर खाली करने का आदेश दे सकता है। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से जुड़ा कानून केवल भरण-पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिले से जुड़े एक मामले में दायर याचिका खारिज कर दी और ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा।
रायगढ़ के मामले में हाईकोर्ट ने बरकरार रखा ट्रिब्यूनल का आदेश
मामला रायगढ़ जिले के घरघोड़ा क्षेत्र का है, जहां एक बुजुर्ग महिला ने अपने ही मकान का कब्जा वापस दिलाने की मांग की थी। संबंधित मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके नाम पर बनाया गया था, लेकिन उस पर उनके बेटे का कब्जा बताया गया। पहले मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने मकान बुजुर्ग महिला को सौंपने का आदेश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर दोबारा सुनवाई हुई और पहले दिए गए निर्देश को लागू करने के आदेश जारी किए गए। बाद में अपीलीय प्राधिकरण ने भी ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना। इसके बाद मामला हाईकोर्ट(High Court) पहुंचा, जहां अदालत ने भी निचली प्राधिकरणों के निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
संपत्ति विवाद अलग, बुजुर्गों की सुरक्षा अलग : हाईकोर्ट
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संपत्ति पैतृक है और स्वामित्व का विवाद सिविल कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का अधिकार नहीं है। हालांकि हाईकोर्ट(High Court) ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल किसी संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं करता, बल्कि उसका दायित्व वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और रहने के अधिकार की रक्षा करना है। यदि किसी बुजुर्ग के साथ रहने वाला व्यक्ति उनके लिए परेशानी का कारण बनता है, तो ट्रिब्यूनल आवश्यक आदेश जारी कर सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट में संपत्ति विवाद लंबित होने से ट्रिब्यूनल की कार्रवाई प्रभावित नहीं होती।
भरण-पोषण और सम्मानजनक जीवन दोनों की जिम्मेदारी तय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का उद्देश्य बुजुर्गों को आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना भी है। इसी मामले में अपीलीय प्राधिकरण द्वारा बेटों को अपनी मां के भरण-पोषण के लिए मासिक राशि देने का निर्देश भी बरकरार रखा गया। अदालत ने माना कि कानून का मकसद बुजुर्गों को उनके अपने घर में सम्मानपूर्वक रहने का अधिकार दिलाना है। इस फैसले को वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और भविष्य में ऐसे मामलों में यह एक अहम कानूनी आधार बन सकता है।

