शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, गिनाए 5 बड़े नुकसान

दिल्ली। शराबबंदी (liquor ban) की नीति कितनी प्रभावी है और इससे वास्तव में क्या हासिल हो रहा है, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम टिप्पणी की।
महाराष्ट्र में मेथनॉल की बिक्री से जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियों का जिक्र किया।
पीठ ने कहा कि पूर्ण शराबबंदी (liquor ban) के साथ कई बार ऐसी समस्याएं सामने आती हैं, जिनमें सरकारी राजस्व का नुकसान, कानून लागू करने का खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब का कारोबार और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का खतरा शामिल है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने शराबबंदी के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं होता।
अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि शराब की बिक्री पर रोक के बावजूद यदि अवैध और जहरीली शराब का कारोबार बढ़ता है तो ऐसी नीति का उद्देश्य किस हद तक पूरा हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने गिनाईं शराबबंदी की 5 बड़ी चुनौतियां
1. सरकारी राजस्व का नुकसान: शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगने से सरकार को आबकारी शुल्क के रूप में मिलने वाला बड़ा राजस्व खत्म हो जाता है। शराब कई राज्यों में सरकार की आय का महत्वपूर्ण स्रोत रही है। शराबबंदी लागू होने के बाद इस राजस्व की भरपाई के लिए सरकार को दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
2. कानून लागू करने पर भारी खर्च: शराबबंदी के बावजूद अवैध बिक्री और तस्करी रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन को लगातार निगरानी करनी पड़ती है। सीमावर्ती इलाकों में जांच, छापेमारी और तस्करी रोकने की कार्रवाई पर सरकारी संसाधन खर्च होते हैं।
3. भ्रष्टाचार का खतरा: कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़ी तीसरी चुनौती पुलिस और प्रशासन में भ्रष्टाचार की संभावना को बताया। प्रतिबंधित सामान की अवैध बिक्री से जुड़े नेटवर्क को रोकने के दौरान रिश्वतखोरी और मिलीभगत जैसी शिकायतों का खतरा बना रहता है।
4. अवैध और जहरीली शराब का कारोबार: अदालत ने सबसे गंभीर चुनौतियों में अवैध शराब के बाजार का भी उल्लेख किया। जब वैध तरीके से शराब उपलब्ध नहीं होती, तब अवैध कारोबारी सक्रिय हो सकते हैं। ऐसे में बिना गुणवत्ता नियंत्रण के तैयार की गई नकली या जहरीली शराब लोगों की जान के लिए खतरा बन सकती है।
5. दूसरे नशीले पदार्थों का खतरा: कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि शराब की उपलब्धता कम होने पर कुछ लोग नशे के दूसरे विकल्पों की ओर जा सकते हैं। इससे ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की समस्या बढ़ने का खतरा रहता है।
महाराष्ट्र के मेथनॉल नियमों पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18ए और 18बी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई। इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद और बिक्री को लेकर कुछ शर्तें लगाई गई थीं। गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था।
ये नियम 1991 में मुंबई में मेथनॉल युक्त जहरीली शराब पीने से 93 लोगों की मौत के बाद बनाए गए थे। रसायन निर्माताओं और इंडियन केमिकल काउंसिल सहित याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों को चुनौती दी थी।
पीठ ने इन नियमों को रद्द करते हुए कहा कि सरकार की मंशा जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकना हो सकती है, लेकिन किसी नियम को सिर्फ अच्छी मंशा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि सरकार को यह दिखाना होगा कि संबंधित नियम का उद्देश्य और उसके लिए अपनाया गया तरीका आपस में तार्किक रूप से जुड़ा हुआ है।
गुजरात और मध्य प्रदेश की घटनाओं का जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात और मध्य प्रदेश में हुई जहरीली शराब (liquor ban) की घटनाओं का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार गुजरात के भावनगर में हाल की घटना में 13 लोगों और मध्य प्रदेश के सागर में 15 लोगों की मौत हुई थी। पीठ ने इन घटनाओं को अधिकारियों के लिए चेतावनी के तौर पर देखने की बात कही।
अदालत ने गुजरात में शराबबंदी के बावजूद सामने आई जहरीली शराब की घटनाओं का भी जिक्र किया। कोर्ट के मुताबिक, गुजरात में स्वतंत्रता के बाद से कई बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां सामने आई हैं, जिनमें 600 से ज्यादा लोगों की जान जाने का उल्लेख किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने से जहरीली शराब बनने की समस्या किस तरह खत्म होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि दूसरे मिलावटी पदार्थों का इस्तेमाल करके नकली शराब बनाने की संभावना को कैसे रोका जाएगा।



