पत्नी का अपमानजनक व्यवहार और लगातार विवाद मानसिक क्रूरता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति को दी तलाक की मंजूरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी की है। अदालत ने पत्नी द्वारा पति को कथित तौर पर ‘भिखारी’ और ‘हैसियतहीन’ कहकर अपमानित करने, मारपीट करने और बुजुर्ग मां से अलग रहने का दबाव बनाने जैसे आरोपों को पूरे मामले के संदर्भ में मानसिक क्रूरता माना।
हाईकोर्ट ने जगदलपुर परिवार न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य वैवाहिक झगड़े अपने आप में तलाक का आधार नहीं बनते, लेकिन लगातार अपमान, अविश्वास और तनावपूर्ण माहौल वैवाहिक जीवन को असहनीय बना सकता है।
2017 में हुआ था विवाह, कोई संतान नहीं
मामला बस्तर जिले के जगदलपुर निवासी मित्तेश पणिग्राही और वेदवती उर्फ ममता से जुड़ा है। दोनों का विवाह 8 जून 2017 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। दंपती की कोई संतान नहीं है।
पति ने आरोप लगाया था कि इलेक्ट्रॉनिक्स की छोटी दुकान से होने वाली सीमित कमाई को लेकर पत्नी उसे भिखारी और हैसियतहीन कहकर अपमानित करती थी। इसके अलावा उसने गाली-गलौज, मारपीट, चरित्र पर संदेह करने और अपनी बुजुर्ग मां से अलग रहने का दबाव बनाने की शिकायत भी की थी।
वहीं, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए ससुराल में प्रताड़ित किए जाने और दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाया था।
परिवार न्यायालय का फैसला हाईकोर्ट ने किया रद्द
जगदलपुर परिवार न्यायालय ने 10 दिसंबर 2022 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की पीठ ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों की समीक्षा की। अदालत ने माना कि कुछ व्यक्तिगत आरोपों के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय प्रमाण नहीं थे, लेकिन पति की गवाही को उसकी मां के बयान से समर्थन मिला।
लगातार अपमान और अविश्वास को माना मानसिक क्रूरता
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में किसी एक घटना को अलग करके देखने के बजाय पूरे घटनाक्रम और उसके समग्र प्रभाव पर विचार करना जरूरी है।
पीठ के अनुसार, लगातार विवाद, अपमान और गंभीर अविश्वास वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं और पति-पत्नी के लिए साथ रहना कठिन बना सकते हैं।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जगदलपुर परिवार न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया और पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी।



