आरक्षण पर तीन दिन में दो बड़े फैसले, मध्य प्रदेश में OBC का 27% और कर्नाटक में SC-ST का बढ़ा कोटा रद्द

नई दिल्ली। आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। महज तीन दिनों के भीतर मध्य प्रदेश और कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरक्षण से जुड़े दो अहम फैसले सुनाते हुए दोनों राज्यों में बढ़ाए गए आरक्षण को रद्द कर दिया। इन फैसलों में अदालतों ने 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और इसे पार करने के लिए आवश्यक संवैधानिक व कानूनी आधार पर जोर दिया है।
मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के प्रावधान को असंवैधानिक ठहराया गया है। वहीं, कर्नाटक में अनुसूचित जाति (SC) का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने की व्यवस्था रद्द कर दी गई है।
आरक्षण का मुद्दा केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षा में सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सामाजिक न्याय, समान अवसर और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व से भी है। ऐसे में इन दोनों फैसलों ने आरक्षण बढ़ाने की प्रक्रिया और उसके कानूनी आधार पर नए सवाल खड़े किए हैं।
मध्य प्रदेश में OBC का 27% आरक्षण क्यों हुआ रद्द?
9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने वाले कानून को असंवैधानिक करार दिया। इस बढ़ोतरी के बाद राज्य में कुल आरक्षण 63 प्रतिशत हो गया था। यह बदलाव तत्कालीन कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में किया गया था।
अदालत ने माना कि OBC के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण का आधार मौजूद है, लेकिन इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए पर्याप्त कानूनी औचित्य प्रस्तुत नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियों का ठोस आधार होना जरूरी है।
अदालत के अनुसार, राज्य सरकार ऐसी परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाई। साथ ही, कानून बनाते समय आवश्यक परामर्श प्रक्रिया का पालन किए जाने को लेकर भी सवाल उठे।
सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षा में पुरानी व्यवस्था लागू
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य को यह बताना जरूरी है कि संबंधित वर्ग का प्रतिनिधित्व कितना कम है और अतिरिक्त आरक्षण की आवश्यकता क्यों है। अदालत ने 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को उचित ठहराने वाले आधारों को पर्याप्त नहीं माना।
फैसले के अनुसार, सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में OBC आरक्षण 14 प्रतिशत की पुरानी व्यवस्था के अनुसार रहेगा। अदालत ने विवादित व्यवस्था के तहत रोके गए पदों पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए।
कर्नाटक में SC-ST का बढ़ा आरक्षण भी रद्द
मध्य प्रदेश के फैसले के तीन दिन बाद, 12 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए बढ़ाए गए आरक्षण को रद्द कर दिया।
कर्नाटक सरकार ने अक्टूबर 2022 में कानून बनाकर SC आरक्षण को 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST आरक्षण को 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया था। राज्य में OBC के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण पहले की तरह बरकरार था। इस बदलाव के बाद कुल आरक्षण 56 प्रतिशत हो गया था।
सामाजिक कार्यकर्ताओं महेंद्र मित्र और एचआर सागर ने इस व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने आरक्षण में की गई बढ़ोतरी को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से आवश्यक परामर्श नहीं किया था।
कर्नाटक सरकार ने फैसले के बाद आगे के कानूनी विकल्पों पर विचार करने की बात कही है।
50 प्रतिशत की सीमा और कानूनी आधार पर जोर
दोनों मामलों में अदालतों ने आरक्षण बढ़ाने के लिए पर्याप्त कानूनी और संवैधानिक आधार की आवश्यकता पर जोर दिया। फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि आरक्षण में बढ़ोतरी के लिए केवल राजनीतिक घोषणा या आबादी के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। इसके पीछे संबंधित समुदायों के प्रतिनिधित्व, आवश्यक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ा ठोस आधार होना चाहिए।
हालांकि, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था अलग संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक फैसलों से जुड़ी है। इसलिए सभी आरक्षण व्यवस्थाओं की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं मानी जा सकती।
पहले भी आरक्षण की बढ़ोतरी को अदालतों में मिली चुनौती
आरक्षण की सीमा बढ़ाने के कई प्रयासों को पहले भी अदालतों में चुनौती दी जा चुकी है।
– महाराष्ट्र: वर्ष 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया था। इस व्यवस्था के तहत शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 12 से 13 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था।
– छत्तीसगढ़: वर्ष 2012 में ST आरक्षण बढ़ाकर 32 प्रतिशत किया गया था, जिससे कुल आरक्षण 58 प्रतिशत हो गया। हाईकोर्ट ने वर्ष 2022 में इस व्यवस्था को रद्द कर दिया था।
– आंध्र प्रदेश: पिछड़ा वर्ग के लिए 34 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को भी हाईकोर्ट में चुनौती मिली और इसे खारिज कर दिया गया।
– राजस्थान: गुर्जर सहित पांच जातियों को अतिरिक्त 5 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रयासों को भी अदालत में चुनौती दी गई।
मध्य प्रदेश और कर्नाटक के हालिया फैसलों के बाद अब दोनों राज्यों में आरक्षण व्यवस्था और उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। इन मामलों का असर सरकारी भर्तियों, उच्च शिक्षा में प्रवेश और आरक्षण नीतियों से जुड़े आगामी निर्णयों पर पड़ सकता है।



