ग्वादर में नेवल बेस योजना पर बढ़ा विवाद, स्थानीय लोगों ने उठाए विकास और अधिकारों के सवाल

ग्वादर। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के प्रमुख केंद्र ग्वादर में पाकिस्तान नौसेना के प्रस्तावित नए नेवल बेस को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। स्थानीय लोगों और हक दो तहरीक आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार और सेना सुरक्षा तथा रणनीतिक परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि क्षेत्र की बुनियादी समस्याएं अब भी अनसुलझी हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि ग्वादर में अरबों डॉलर की विकास परियोजनाएं शुरू की गईं, लेकिन आम लोगों को उनका अपेक्षित लाभ नहीं मिला। शहर के कई इलाकों में आज भी पानी, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजगार की समस्याएं बनी हुई हैं।
CPEC परियोजनाओं पर उठे सवाल
सरकार ग्वादर को पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य का केंद्र बताती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि बंदरगाह पर अपेक्षित व्यावसायिक गतिविधियां नहीं हो रही हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में ग्वादर बंदरगाह पर केवल 34 हजार टन माल का कारोबार हुआ, जबकि 2023 में पूरे साल में महज 17 जहाज यहां पहुंचे थे। दूसरी ओर पाकिस्तान का अधिकांश समुद्री व्यापार अब भी कराची और पोर्ट कासिम के जरिए संचालित होता है।
नौसैनिक अड्डे की योजना पर आपत्ति
पाकिस्तान नौसेना ग्वादर में एक बड़े नौसैनिक अड्डे के निर्माण की योजना पर काम कर रही है। नौसेना का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री मार्गों की रक्षा और महत्वपूर्ण निवेशों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
हालांकि स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस परियोजना को लेकर व्यापक जनपरामर्श नहीं किया गया। उनका सवाल है कि क्या ग्वादर के लोगों से पूछा गया कि वे अपने तटीय क्षेत्र में बड़े सैन्य अड्डे की स्थापना चाहते हैं या नहीं।
2021 से जारी है आंदोलन
नवंबर 2021 से ग्वादर में पानी, बिजली, रोजगार और मछुआरों के अधिकारों को लेकर लगातार आंदोलन चल रहा है। समय के साथ यह आंदोलन राजनीतिक अधिकारों और स्थानीय भागीदारी की मांग में बदल गया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि ऐसा विकास चाहते हैं जिसमें स्थानीय लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए और उन्हें प्रत्यक्ष लाभ मिले।
मछुआरों को मिली कानूनी पहचान
हक दो तहरीक आंदोलन के दबाव के बाद पाकिस्तान में मछुआरों को श्रमिकों के रूप में कानूनी मान्यता दी गई, जो आंदोलन की बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। इसके अलावा आंदोलन के नेता मौलाना हिदायत उर रहमान राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करने में भी सफल रहे।
‘सुरक्षा पहले’ मॉडल पर आलोचना
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्वादर में अपनाया गया विकास मॉडल मुख्य रूप से सुरक्षा, CPEC परियोजनाओं और रणनीतिक हितों पर केंद्रित है। आलोचकों का कहना है कि स्थानीय समुदायों, मछुआरों और तटीय परिवारों की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।
स्थानीय भागीदारी की मांग
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का सुझाव है कि ग्वादर के विकास में स्थानीय लोगों को भागीदार बनाया जाए। उनका कहना है कि पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देने के साथ-साथ बड़े प्रोजेक्ट्स पर स्थानीय समुदायों की सहमति भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि विकास का केंद्र आम नागरिक नहीं होंगे, तो बड़े निवेश और परियोजनाएं भी क्षेत्र में स्थायी शांति और समृद्धि नहीं ला पाएंगी।

