डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक होंगे अलग अपराध, सरकार संसद में ला सकती है बिल

दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनाए जाने वाले डीपफेक के बढ़ते खतरे के बीच सरकार ( bill) इन्हें अलग अपराध के तौर पर परिभाषित करने की तैयारी कर रही है।
सरकार मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि संसद के मौजूदा सत्र में इस संबंध में एक बिल पेश किया जा सकता है। प्रस्तावित कानून में डिजिटल अरेस्ट और AI-जनरेटेड डीपफेक को अलग-अलग अपराध मानकर इनके लिए सजा का प्रावधान किया जा सकता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ( bill) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इस मुद्दे पर विचार कर रही है। कानून का उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसे अपराधों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा तय करना और इनके लिए सजा निर्धारित करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया था कानूनी प्रावधान का सवाल
डिजिटल अरेस्ट के मामलों पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत ने ऐसे मामलों में आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। कई मामलों में जमानत से भी इनकार किया गया है। हालांकि, कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा आपराधिक कानूनों में डिजिटल अरेस्ट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि सरकार को आपराधिक कानूनों में डिजिटल अरेस्ट ( bill) को औपचारिक रूप से परिभाषित करने पर विचार करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जबरन वसूली, लूट और संगठित अपराध जैसे तत्वों वाले डिजिटल अरेस्ट मामलों में अलग अपराध और संपत्ति जब्ती जैसी कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए या नहीं।
डीपफेक पर भी चिंता
जस्टिस बागची ने कहा कि नए अपराधों की परिभाषा और कानून बनाना सरकार का काम है। उन्होंने डीपफेक के बढ़ते इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा कि इसका उपयोग लोगों को गुमराह करने, धोखाधड़ी करने और किसी दूसरे व्यक्ति का रूप धारण करने के लिए किया जा सकता है।
अटॉर्नी जनरल ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट रोकने के लिए बनी अंतर-विभागीय समिति सिस्टम की कमियों की पहचान कर रही है। समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सामने आ रहे डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच सीबीआई को भी सौंपी है।

