चुनाव आयुक्त नियुक्ति विवाद: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से बड़ी बेंच में सुनवाई की मांग की, पारदर्शिता पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए। सरकार का तर्क है कि यह संवैधानिक महत्व का मामला है और इस पर बड़ी बेंच ही फैसला कर सकती है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच के सामने सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) और 327 के तहत संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून बनाने का अधिकार है, इसलिए इस मामले की सुनवाई संविधान पीठ को करनी चाहिए।
सरकार की मांग पर याचिकाकर्ताओं ने उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि 28 बार सुनवाई होने के बाद अब मामले को बड़ी बेंच में भेजने की मांग करना उचित नहीं है। उन्होंने इसे सुनवाई में देरी की कोशिश बताया।
यह याचिका डॉक्टर जया गुप्ता और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 2023 में दायर की थी। याचिका में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून को चुनौती दी गई है, क्योंकि इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर रखा गया है।
सुनवाई के दौरान तीखी बहस
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार की निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि “क्या देश में कोई दागी मंत्री नहीं है?”
सरकार ने 2023 के अनूप बरनवाल फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें संविधान पीठ ने संसद को इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार माना था। सरकार का कहना है कि यदि उस फैसले की व्याख्या का सवाल है तो इसकी सुनवाई भी संविधान पीठ ही करे।
2029 के चुनाव का भी आया जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यदि मामला बड़ी बेंच को भेजा गया तो सुनवाई में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले वर्तमान कानून के तहत ही नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हो जाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जनवरी 2029 और चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू जुलाई 2028 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के अंत में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि “जैसे न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए, उसी तरह नियुक्ति प्रक्रिया भी सिर्फ पारदर्शी नहीं होनी चाहिए, बल्कि पारदर्शी दिखनी भी चाहिए।”
अदालत ने सभी पक्षों से लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे का फैसला करेगा।

