BRICS में दुनिया को भारत ने क्या संदेश दिया? मोदी की कूटनीति, मतभेदों के बावजूद कैसे बनी सहमति?

नई दिल्ली। दुनिया इस समय कई बड़े संकटों और तनाव से गुजर रही है। मिडिल-ईस्ट में संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की बदलती टैरिफ नीतियों के बीच भारत में आयोजित BRICS 2026 शिखर सम्मेलन का महत्व और बढ़ गया। इस सम्मेलन में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जब सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद मौजूद हैं, तब क्या कोई साझा रास्ता निकाला जा सकता है? सम्मेलन के दौरान नई दिल्ली डिक्लेरेशन को स्वीकार किया जाना इसी सवाल का महत्वपूर्ण जवाब माना जा रहा है।
भारत ने BRICS के मंच से यह संदेश देने की कोशिश की कि वैश्विक स्तर पर मतभेद होने के बावजूद बातचीत, सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था के जरिए साझा समाधान तलाशे जा सकते हैं। भारत के लिए BRICS केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने वाला मंच भी है।
मतभेदों के बीच बनी सहमति
BRICS 2026 में सदस्य देशों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर विचारों में अंतर के बावजूद नई दिल्ली डिक्लेरेशन को स्वीकार किया गया। इसमें सहयोग, बहुपक्षीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया।
भारत ने इस दौरान टकराव की राजनीति के बजाय संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देने का संदेश दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की भूमिका और उनकी आवाज को लेकर भी सवाल उठाए।
प्रधानमंत्री मोदी ने मौजूदा ग्लोबल सिस्टम को ‘प्रिविलेज के पिरामिड’ जैसा बताते हुए कहा कि ग्लोबल साउथ के देश कई वैश्विक संकटों का सबसे ज्यादा सामना करते हैं, लेकिन वैश्विक फैसले लेने की प्रक्रिया में उनकी आवाज अपेक्षाकृत कम सुनाई देती है।
BRICS में भारत का बड़ा संदेश
BRICS सम्मेलन के दौरान भारत की कूटनीति का मुख्य फोकस बातचीत और संवाद पर रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए।
भारत ने वैश्विक शासन व्यवस्था को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला और समावेशी बनाने की जरूरत पर जोर दिया। भारत का कहना रहा कि दुनिया के अलग-अलग देशों की आवाज को वैश्विक संस्थाओं और फैसलों में उचित स्थान मिलना चाहिए।
इसके साथ ही विकास और मानव कल्याण को वैश्विक प्रयासों के केंद्र में रखने की जरूरत भी बताई गई। भारत के नजरिए से BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन साझा हितों वाले मुद्दों पर सहयोग की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।
यही भारत की कूटनीति का अहम संदेश रहा कि मतभेदों को खत्म करना जरूरी नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद साथ काम करने का रास्ता तलाशना जरूरी है।
ईरान-UAE मुलाकात ने बढ़ाया सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व
BRICS सम्मेलन के दौरान एक और घटनाक्रम ने कूटनीतिक स्तर पर ध्यान खींचा। 11 सितंबर को भारत मंडपम में UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी से मुलाकात और बातचीत हुई।
यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव और मतभेद गहरे बने हुए हैं। हालांकि इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच सभी मतभेद खत्म होने के तौर पर नहीं देखा जा सकता, लेकिन संवाद का होना अपने आप में कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
BRICS जैसे बहुपक्षीय मंच की उपयोगिता भी ऐसे ही घटनाक्रमों से सामने आती है। अलग-अलग देशों को एक ही मंच पर लाकर बातचीत की संभावनाएं पैदा करना वैश्विक तनाव के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत ने दिया संवाद और सहयोग का संदेश
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति पर जोर देता रहा है। BRICS 2026 में भी इसी सोच की झलक देखने को मिली।
नई दिल्ली डिक्लेरेशन के जरिए सदस्य देशों ने साझा मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की। वहीं भारत ने यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया कि दुनिया भले ही अलग-अलग खेमों में बंटी दिखाई दे रही हो, लेकिन वैश्विक समस्याओं का समाधान मिलकर ही निकाला जा सकता है।
भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए भी अहम रहा क्योंकि उसने ग्लोबल साउथ की आवाज, बहुपक्षीय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कानून और संवाद आधारित कूटनीति को प्रमुखता दी।
कुल मिलाकर BRICS 2026 में भारत का संदेश साफ दिखाई दिया—दुनिया में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बातचीत के दरवाजे बंद नहीं होने चाहिए। भारत ने टकराव के बजाय संवाद और साझा हितों पर सहयोग की राह को आगे बढ़ाने की कोशिश की। यही बंटी हुई दुनिया के बीच भारत की BRICS कूटनीति की सबसे बड़ी तस्वीर बनकर सामने आई।



