UNSC में वीटो पावर खत्म करने की मांग, एर्दोगन बोले- 190 से ज्यादा देशों का फैसला 5 देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए; जानें क्या है पूरी व्यवस्था

संयुक्त राष्ट्र। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की मौजूदा व्यवस्था एक बार फिर सुधार की बहस के केंद्र में है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—को मिले वीटो अधिकार को खत्म करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था दुनिया की बदलती वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती।
एर्दोगन ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की व्यवस्था को भी खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। उनके मॉडल में परिषद के सभी सदस्यों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा तय अवधि के लिए किया जाएगा और किसी देश को स्थायी सीट या वीटो का विशेषाधिकार नहीं मिलेगा।
आखिर क्या है UNSC का वीटो अधिकार?
UNSC में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें 5 स्थायी सदस्य और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिए कम से कम 9 वोट जरूरी होते हैं। हालांकि, महत्वपूर्ण यानी गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्तावों पर पांच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का वीटो प्रस्ताव को रोक सकता है।
इसी विशेषाधिकार के कारण सुरक्षा परिषद में वैश्विक संघर्षों से जुड़े कई प्रस्तावों पर गतिरोध की स्थिति बनती रही है। एर्दोगन ने इसी व्यवस्था को बदलने की मांग की है।
एर्दोगन का पूरा प्रस्ताव क्या है?
एर्दोगन की मांग केवल वीटो खत्म करने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मौजूदा व्यवस्था भी समाप्त की जानी चाहिए। उनके प्रस्ताव के मुताबिक, सदस्य देशों का चुनाव महासभा करे और उन्हें निश्चित अवधि के लिए जिम्मेदारी दी जाए।
एर्दोगन का तर्क है कि केवल नए स्थायी सदस्यों को जोड़ने से समस्या का मूल समाधान नहीं होगा। उनका प्रस्ताव निर्णय लेने की शक्ति को ज्यादा व्यापक रूप से बांटने पर केंद्रित है।
वीटो खत्म करना इतना मुश्किल क्यों है?
सबसे बड़ी चुनौती संयुक्त राष्ट्र चार्टर में है। चार्टर के आर्टिकल 108 के मुताबिक, संशोधन को महासभा के दो-तिहाई सदस्यों के वोट और संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई सदस्य देशों की संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मंजूरी चाहिए। इसमें सभी पांच स्थायी सदस्यों की मंजूरी अनिवार्य है।
यानी अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस की सहमति के बिना मौजूदा वीटो व्यवस्था को खत्म करने वाला चार्टर संशोधन लागू नहीं हो सकता।
रूस ने एर्दोगन के प्रस्ताव पर क्या कहा?
एर्दोगन की मांग के बाद रूस ने मौजूदा वीटो व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही है। क्रेमलिन के मुताबिक, रूस सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन मौजूदा स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार को बनाए रखना जरूरी मानता है।
इससे UNSC सुधार को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं—एक तरफ मौजूदा ढांचे में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने का विचार है, जबकि एर्दोगन स्थायी सदस्यता और वीटो दोनों खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।
वीटो खत्म करने के बजाय सीमित करने की पहल भी
वीटो को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय कुछ गंभीर परिस्थितियों में इसके इस्तेमाल को सीमित करने की पहल भी चल रही है। फ्रांस और मैक्सिको ने 2015 में नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध और बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध जैसे मामलों में स्थायी सदस्यों से स्वेच्छा से वीटो का इस्तेमाल रोकने की अपील वाली पहल शुरू की थी।
सितंबर 2026 में फ्रांस और मैक्सिको के मुताबिक, इस राजनीतिक घोषणा को 128 देशों का समर्थन मिल चुका है। हालांकि, यह पहल कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है UNSC सुधार?
UNSC सुधार की बहस भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक बनाने और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है। सितंबर 2026 में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को लेकर Visegrád Group के चार देशों—हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य—ने समर्थन जताया है।
इस तरह UNSC सुधार पर मौजूदा बहस में अलग-अलग मॉडल सामने हैं—एक ओर स्थायी सदस्यता और वीटो को समाप्त करने का एर्दोगन का प्रस्ताव है, तो दूसरी ओर मौजूदा ढांचे का विस्तार कर नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने का विचार है।
फिलहाल, किसी भी बड़े बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन और पांचों मौजूदा स्थायी सदस्यों की मंजूरी जरूरी है। यही शर्त UNSC की वीटो व्यवस्था में तत्काल बदलाव की सबसे बड़ी संस्थागत बाधा है।



