‘अमारी सिल्क’ ब्रांड से छत्तीसगढ़ के रेशम उत्पादों को नई पहचान, 360 महिलाओं को रोजगार

रायपुर। छत्तीसगढ़ में पारंपरिक रेशम और हथकरघा उत्पादों को नई पहचान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री जयंती के अवसर पर खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड की ओर से आयोजित कार्यक्रम में ‘अमारी सिल्क’ ब्रांड लॉन्च किया गया। यह ब्रांड कोसा फलों से तितलियों के स्वतः बाहर निकलने के बाद तैयार किए जाने वाले अहिंसक रेशम धागे यानी अहिंसा सिल्क पर आधारित है।
इस पहल का उद्देश्य रेशम उत्पादन से जुड़े महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना और छत्तीसगढ़ के रेशम उत्पादों को बाजार में एक अलग पहचान दिलाना है। विभाग के अनुसार, अमारी सिल्क पहल से प्रदेश के 11 जिलों के 13 महिला स्व-सहायता समूहों से जुड़ी करीब 360 महिलाओं को रोजगार मिल रहा है।
कार्यक्रम में स्कूल शिक्षा एवं ग्रामोद्योग मंत्री गजेन्द्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े, कौशल विकास विभाग मंत्री गुरु खुशवंत साहेब, रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल सहित विभिन्न बोर्ड और आयोगों के अध्यक्ष, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
अहिंसा सिल्क को मिला ‘अमारी सिल्क’ ब्रांड नाम
कार्यक्रम की प्रमुख घोषणा ‘अमारी सिल्क’ ब्रांड की लॉन्चिंग रही। इस ब्रांड के तहत ऐसे अहिंसक रेशम धागे को बढ़ावा दिया जाएगा, जिसे कोसा फलों से तितलियों के स्वतः बाहर निकलने के बाद तैयार किया जाता है।
पारंपरिक रेशम उत्पादन की तुलना में अहिंसा सिल्क की प्रक्रिया में कोसा से तितली के प्राकृतिक रूप से बाहर निकलने के बाद प्राप्त रेशे का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह तैयार होने वाले उत्पादों को बाजार में अलग पहचान देने और उनसे जुड़े समूहों को बेहतर आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इसे ‘अमारी सिल्क’ ब्रांड के रूप में पेश किया गया है।
11 जिलों की 360 महिलाओं को रोजगार
विभाग के अनुसार, इस पहल से 11 जिलों के 13 महिला स्व-सहायता समूहों की 360 महिलाएं रोजगार से जुड़ी हैं। इससे रेशम उत्पादन और धागाकरण से जुड़े काम को ग्रामीण महिलाओं की आय के साधन के रूप में विकसित करने की दिशा में मदद मिलने की उम्मीद है।
इसके साथ ही बस्तर संभाग में टसर कीट पालन और धागाकरण के क्षेत्र में 360 प्रशिक्षार्थियों का प्रशिक्षण भी शुरू किया गया है। इसके लिए करीब 29.49 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।
विभाग का उद्देश्य प्रशिक्षण के माध्यम से स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना और टसर उत्पादन से जुड़े लोगों को उत्पादन से लेकर बिक्री तक की प्रक्रिया से जोड़ना है।
‘रेशम सेतु’ से महिलाओं को मिलेगा बाजार
टसर धागों की बिक्री में बिचौलियों की भूमिका कम करने और महिला समूहों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने के लिए ‘रेशम सेतु’ नाम से एक विक्रय मंच तैयार करने की व्यवस्था की जा रही है।
इस मंच से 79 महिला समूहों को जोड़ने की योजना है। इसका उद्देश्य रेशम उत्पादों को सीधे बाजार तक पहुंचाने और उत्पाद तैयार करने वाले समूहों को बेहतर बिक्री अवसर उपलब्ध कराना है।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू होती है तो उत्पादन करने वाले महिला समूहों को बाजार से सीधे जुड़ने में मदद मिल सकती है और बिक्री प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है।
खादी उत्पादन केंद्र और प्रीमियम आउटलेट का शुभारंभ
कार्यक्रम के दौरान खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड की कई अन्य योजनाओं और परियोजनाओं की भी शुरुआत की गई।
कुंवरगढ़, जिला रायपुर में 55 लाख रुपये की लागत से निर्मित खादी उत्पादन केंद्र का वर्चुअल शुभारंभ किया गया। इसके साथ ही अंबिकापुर में 20 लाख रुपये की लागत से तैयार प्रीमियम खादी सेल्स आउटलेट का भी वर्चुअल लोकार्पण किया गया।
इन केंद्रों के माध्यम से खादी उत्पादन और बिक्री से जुड़े काम को बढ़ावा देने की योजना है। इससे स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विपणन की गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है।
विशेष पिछड़ी जनजातियों की 30 महिलाओं को सोलर चरखा
कार्यक्रम में जशपुर, कोरबा, बस्तर और सुकमा जिले की विशेष पिछड़ी जनजातियों से जुड़ी 30 महिलाओं को सोलर चरखा वितरित किया गया।
सोलर चरखे के जरिए महिलाओं को स्थानीय स्तर पर सूत कातने और रोजगार से जुड़ने का अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। विभाग की योजनाओं में विशेष पिछड़ी जनजातियों की महिलाओं को प्रशिक्षण और स्वरोजगार से जोड़ना भी शामिल है।
इसके अलावा दो उत्कृष्ट बुनकरों और दो उत्कृष्ट कत्तिनों को 21-21 हजार रुपये की प्रोत्साहन एवं सम्मान राशि प्रदान की गई।
मुख्यमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत अनुदान
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम यानी CMEGP के तहत 100 से अधिक हितग्राहियों को करीब 50 लाख रुपये की अनुदान राशि वितरित की गई।
इसके साथ ही कारीगरों को प्रशिक्षण के लिए 67,500 रुपये की प्रशिक्षण वृत्ति भी प्रदान की गई। इन योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और छोटे स्तर के उद्यमों को बढ़ावा देना है।
बुनकरों के लिए 21.96 लाख रुपये की सहायता
हाथकरघा प्रभाग की ओर से बुनकरों को उन्नत उपकरण उपलब्ध कराने के लिए 122 हितग्राहियों के लिए 21.96 लाख रुपये की अनुदान राशि स्वीकृत की गई है।
वहीं, 26 बुनकरों को व्यक्तिगत वर्कशेड-सह-आवास के लिए 65 लाख रुपये की अनुदान राशि स्वीकृत की गई। इससे बुनकरों को काम करने के लिए बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है।
बस्तर संभाग के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास केंद्रों से जुड़े 80 हितग्राहियों के लिए नवीन बुनाई प्रशिक्षण की शुरुआत भी की गई।
‘बिलासा हैंडलूम’ की वेबसाइट लॉन्च
छत्तीसगढ़ के हाथकरघा उत्पादों को ऑनलाइन बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में ‘बिलासा हैंडलूम’ की व्यावसायिक वेबसाइट भी लॉन्च की गई।
ऑनलाइन बिक्री के माध्यम से प्रदेश के हाथकरघा उत्पादों को स्थानीय बाजार के साथ-साथ व्यापक ग्राहकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे पारंपरिक उत्पादों के लिए डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स के अवसर बढ़ सकते हैं।
कार्यक्रम में बुनकरों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा और आईडीबीआई बैंक की ओर से सीएसआर मद से 250 इयरफोन भी वितरित किए गए।
जनजातीय महिलाओं को खिलौना निर्माण का प्रशिक्षण
ग्रामोद्योग विभाग के सचिव राजेश सिंह राणा ने बताया कि प्रदेश की विशेष पिछड़ी जनजातियों की महिलाओं को रायपुर जिले के कुंवरगढ़ स्थित प्रशिक्षण केंद्र में हथकरघा और खादी के बचत कपड़े से खिलौने बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है।
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य कपड़ा निर्माण से निकलने वाले बचत कपड़े के उपयोग के साथ-साथ जनजातीय महिलाओं के लिए आय का अतिरिक्त स्रोत तैयार करना है।
कार्यक्रम में विशेष पिछड़ी जनजातियों की महिलाओं ने संस्कृत में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण की प्रस्तुति दी। इसके अलावा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के संघर्ष और महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित नाट्य प्रस्तुति भी आयोजित की गई। खैरागढ़ स्थित राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भरतनाट्यम के माध्यम से महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन को प्रस्तुत किया।
अमारी सिल्क से रोजगार और बाजार पर फोकस
‘अमारी सिल्क’ की लॉन्चिंग के साथ छत्तीसगढ़ में अहिंसा सिल्क को ब्रांड के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। इस पहल में केवल रेशम उत्पादन ही नहीं, बल्कि महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार, प्रशिक्षण, उत्पादों की बिक्री और बाजार से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है।
अब इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ‘अमारी सिल्क’ के उत्पादों को बाजार में कितनी पहुंच मिलती है और इससे जुड़े महिला समूहों को उत्पादन के साथ-साथ बिक्री से कितनी आर्थिक हिस्सेदारी मिलती है। फिलहाल विभाग की ओर से इसे छत्तीसगढ़ के पारंपरिक रेशम उत्पादों को नई पहचान देने और ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने वाली पहल के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।



