बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और आवामी लीग पर कार्रवाई की तैयारी, 1971 के मामलों की फिर होगी जांच

बांग्लादेश सरकार ने 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़े मामलों की दोबारा जांच कराने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि इसी आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार के निशाने पर जमात-ए-इस्लामी भी है।
गृह मामलों के सलाहकार सलाहुद्दीन चौधरी ने कहा कि 1971 से जुड़े पुराने मामलों की फाइलें फिर से खोली जाएंगी और इतिहास की बड़ी घटनाओं की जांच कराई जाएगी। जांच के आधार पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जमात-ए-इस्लामी क्यों है निशाने पर?
- जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश में लंबे समय से पाकिस्तान समर्थक पार्टी माना जाता है। आरोप है कि 1971 में इसके कई नेताओं ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था।
- राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पार्टी का जनाधार बढ़ रहा है, जिससे सत्तारूढ़ दल के लिए चुनौती पैदा हो रही है।
- बांग्लादेश की राजनीति में विपक्ष को कमजोर करने की प्रवृत्ति पहले भी देखी गई है। माना जा रहा है कि सरकार अब प्रमुख विपक्षी दलों पर दबाव बढ़ाना चाहती है।
सरकार पर जमात का हमला
जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी पार्टी को साजिश के तहत सत्ता से दूर रखा गया और सरकार ने इसमें भूमिका निभाई। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी को विपक्ष में बैठने के लिए मजबूर किया गया।
आवामी लीग भी रडार पर
आवामी लीग ने 2008 से 2024 तक बांग्लादेश में शासन किया। इस दौरान विपक्षी दल बीएनपी ने आरोप लगाया था कि उसे राजनीतिक रूप से कमजोर किया गया। अब माना जा रहा है कि मौजूदा सरकार भी उसी रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
इस बीच, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बांग्लादेश लौटने की इच्छा जताई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उन्हें देश में फिर से सक्रिय राजनीति का अवसर मिलता है, तो मौजूदा सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार, 24 प्रतिशत लोगों ने शेख हसीना के प्रति समर्थन या सकारात्मक रुख व्यक्त किया है।

