छत्तीसगढ़ में ‘महा-हड़ताल’ से सिस्टम हुआ लॉक

रायपुर। छत्तीसगढ़ में इस समय प्रशासनिक और सरकारी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। सूबे में सिर्फ तहसीलदार और नायब तहसीलदार ही सड़कों पर नहीं हैं, बल्कि उनके समर्थन और अपनी-अपनी मांगों को लेकर कई अन्य महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारी-कर्मचारी भी आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुके हैं। राजस्व विभाग से लेकर मैदानी स्तर के कर्मचारियों की इस चौतरफा हड़ताल ने प्रदेश की सरकारी मशीनरी को पूरी तरह ‘लॉक’ कर दिया है, जिससे आम जनता के रोजमर्रा के काम ठप हो गए हैं।
पटवारी, RI और संविदा कर्मियों ने भी खींची तलवारें
तहसीलदारों की हड़ताल के समांतर अब प्रदेश के पटवारी और राजस्व निरीक्षक (RI) भी पूरी ताकत से मैदान में कूद चुके हैं। वेतन विसंगति, भत्ता वृद्धि और सुरक्षा की मांग को लेकर पटवारियों के काम बंद करने से ग्रामीण अंचलों में सन्नाटा पसर गया है। वहीं दूसरी ओर, विभिन्न सरकारी विभागों में बरसों से सेवा दे रहे संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी भी नियमितीकरण की मांग को लेकर राजधानी से लेकर जिला मुख्यालयों तक आंदोलन तेज कर चुके हैं। कुछ जिलों में स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले और संविदा स्वास्थ्य कर्मियों के भी इस सुर में सुर मिलाने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
दफ्तरों में सन्नाटा, छात्र और किसान सब परेशान
इस महा-हड़ताल का सबसे सीधा और घातक असर आम जनता पर पड़ रहा है। चूंकि यह समय स्कूल-कॉलेजों में एडमिशन और नए सत्र की शुरुआत का है, इसलिए जाति, निवास और आय प्रमाण पत्र न बन पाने के कारण छात्र और उनके अभिभावक तहसीलों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। जमीनों की खरीदी-बिक्री, रजिस्ट्री, खसरा-बी1 की नकल और नामांतरण (म्यूटेशन) के मामले पूरी तरह पेंडिंग हो गए हैं, जिससे शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन तो लिए जा रहे हैं, लेकिन उन पर अमलीजामा पहनाने वाला कोई टेबल पर मौजूद नहीं है।
सरकार की साख पर बट्टा, बैकफुट पर ‘सिस्टम’
लगातार हो रही इन हड़तालों और ठप पड़े कामकाज से जनता के बीच सरकार की छवि को बड़ा नुकसान पहुंच रहा है। आम लोगों में यह संदेश जा रहा है कि ब्यूरोक्रेसी और कर्मचारी संगठनों पर सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण ढीला पड़ चुका है। बुनियादी कामों के लिए भटकती जनता के बीच पनप रहा यह आक्रोश सीधे तौर पर सरकार के ‘मिसमैनेजमेंट’ को उजागर कर रहा है, जिससे शासन की साख पर बट्टा लग रहा है।
विपक्ष की बांछें खिलीं
प्रशासनिक अमले की इस बेरुखी ने विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा राजनीतिक हथियार दे दिया है। विपक्ष इस पूरी स्थिति को प्रदेश में “प्रशासनिक आपातकाल” करार दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक विपक्ष सरकार पर तंज कस रहा है कि जो सरकार अपने कर्मचारियों को संभाल नहीं पा रही, वह राज्य क्या चलाएगी। सियासी फायदा उठाने के लिए विपक्ष के बड़े नेता लगातार हड़ताली कर्मचारियों के पंडालों में हाजिरी लगा रहे हैं। वे न सिर्फ उन्हें अपना पूर्ण समर्थन दे रहे हैं, बल्कि इस बड़े और प्रभावशाली वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए सरकार के खिलाफ जमकर सियासी रोटियां भी सेक रहे हैं।
अब देखना होगा कि चौतरफा घिरी सरकार इस गतिरोध को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाती है, या फिर यह हड़ताल सूबे की सियासत में कोई नया उबाल लेकर आती है।

