युद्ध में खपा 2.6 अरब बैरल तेल, भारत की 15 महीने की जरूरत के बराबर ईंधन हुआ बर्बाद

दुनिया में जारी सैन्य संघर्षों और युद्धों का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हालिया आकलनों के अनुसार, युद्ध और सैन्य अभियानों के दौरान करीब 2.6 अरब बैरल कच्चे तेल की खपत या बर्बादी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मात्रा भारत जैसे बड़े देश की लगभग 15 महीने की ईंधन आवश्यकता के बराबर है। ऐसे में वैश्विक तेल आपूर्ति, कीमतों और आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
तेल भंडार पर बढ़ा दबाव, भरपाई में लग सकते हैं 18 महीने
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका-ईरान और इजराइल से जुड़े तनाव के बाद वैश्विक तेल भंडार में बड़ी कमी दर्ज की गई है। अनुमान है कि मौजूदा स्थिति में समाप्त हुए भंडार को दोबारा भरने में करीब 18 महीने का समय लग सकता है। इसके लिए प्रतिदिन औसतन 21 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन की जरूरत होगी।
जानकारों का कहना है कि युद्ध के दौरान लड़ाकू विमानों, मिसाइलों, टैंकों और सैन्य वाहनों में भारी मात्रा में ईंधन की खपत होती है। वहीं तेल भंडारण केंद्रों, रिफाइनरियों और परिवहन मार्गों पर हमलों के कारण भी बड़ी मात्रा में कच्चा तेल नष्ट हुआ है। इसके अलावा लाल सागर क्षेत्र में तनाव के चलते जहाजों को लंबे समुद्री मार्ग अपनाने पड़ रहे हैं, जिससे ईंधन की अतिरिक्त खपत हो रही है।
भारत पर असर और कच्चे तेल की मौजूदा स्थिति
भारत प्रतिदिन लगभग 52 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। ऐसे में युद्ध के दौरान नष्ट हुआ 2.6 अरब बैरल तेल देश की करीब 15 महीने की कुल जरूरत के बराबर माना जा रहा है। यदि वैश्विक आपूर्ति में कमी बनी रहती है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और पेट्रोल-डीजल समेत अन्य ईंधन की कीमतों पर दबाव पड़ने की संभावना है। इसका असर महंगाई और औद्योगिक लागत पर भी देखने को मिल सकता है।
हालांकि हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आई है। ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे कारोबार कर रहा है, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो वैश्विक तेल बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।

