
भारतीय सिनेमा के सबसे निर्भीक, बेबाक और ऊर्जावान अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 75 वर्ष की उम्र में गुरुवार सुबह निधन हो गया। दिल का दौरा पड़ने के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। अपने अभिनय के अनूठे अंदाज, तीखे संवादों और जमीनी समाजसेवा से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले नाना पाटेकर के अचानक चले जाने से पूरे कला जगत, राजनीतिक गलियारों और आम जनता में गहरा शोक छा गया है। सिनेमा के परदे पर सच्चाई की दहाड़ लगाने वाला एक युग आज हमेशा के लिए खामोश हो गया।
सुबह की एक मनहूस खबर जिसने सबको स्तब्ध कर दिया
प्राप्त जानकारी के अनुसार, नाना पाटेकर को गोवा स्थित उनके आवास पर अचानक दिल का गंभीर दौरा पड़ा। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों की टीम ने सीपीआर और हरसंभव प्रयास के बावजूद उन्हें बचाने की कोशिश की, किंतु सुबह उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। जैसे ही यह खबर टीवी स्क्रीन और सोशल मीडिया पर फ्लैश हुई, किसी को भी यकीन नहीं हुआ कि सिनेमाई परदे पर जीवन की हर विसंगति को ललकारने वाला यह फौलादी व्यक्तित्व अब हमारे बीच नहीं रहा।
संवाद अदायगी का वह अनूठा अंदाज जो कभी दोहराया नहीं जा सकेगा
नाना पाटेकर केवल एक अभिनेता नहीं थे, वे अभिनय की एक पूरी पाठशाला थे। 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुद-जंजीरा में जन्मे नाना ने रंगमंच की तपस्या से खुद को तराशा था। उन्होंने जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा ली और मुंबई की सड़कों पर पोस्टर पेंट करने से लेकर थिएटर के तख्तों तक लंबा संघर्ष झेला।
हिंदी और मराठी सिनेमा में जब उन्होंने कदम रखा, तो खलनायकी और नायकत्व की तमाम पारंपरिक परिभाषाएं बदल गईं। उनकी आवाज में एक अलग तरह की खनक, आंखों में एक असहज कर देने वाली तीव्रता और हाथों के इशारों में संवाद बोलने की ऐसी शैली थी, जिसकी नकल तो हजारों ने की, लेकिन बराबरी कोई न कर सका।
‘परिंदा’ (1989): अन्ना सेठ का वह खूंखार किरदार, जिसने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। आग के खौफ और मानसिक तनाव को जिस तरह उन्होंने स्क्रीन पर जिया, वह मील का पत्थर बन गया।
‘क्रांतिवीर’ (1994): प्रताप नारायण तिलक का किरदार और वह ऐतिहासिक संवाद— “ये मुसलमां का खून, ये हिंदू का खून… बता इसमें कौन सा मुसलमां का, कौन सा हिंदू का?” इस दृश्य ने देश के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर दिया था। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर मिला।
‘अग्नि साक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ और ‘प्रहार’: एक तरफ ‘खामोशी’ में एक मूक-बधिर पिता का संवेदनशील दर्द, तो दूसरी ओर ‘प्रहार’ में एक सख्त फौजी अफसर का अनुशासन—नाना ने हर किरदार में आत्मा फूँक दी।
‘नटसम्राट’ (2016): मराठी रंगमंच के इतिहास की यह कालजयी कृति जब परदे पर आई, तो अप्पासाहेब बेलवलकर के किरदार में नाना ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय दिया। हर देखने वाले की आंखें नम हो गई थीं।
हास्य का बेजोड़ रंग: ‘वेलकम’ के ‘उदय शेट्टी’ के रूप में उनका कॉमिक टाइमिंग आज की युवा पीढ़ी और मीम संस्कृति का सबसे पसंदीदा हिस्सा बन गया।
केवल परदे के हीरो नहीं, धरती के मसीहा: ‘नाम फाउंडेशन’
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वे परदे पर जितने उग्र और तीखे थे, आम जिंदगी में उतने ही संवेदनशील और सरल थे। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में जब सूखे और कर्ज के चलते किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर एसी कमरों से बाहर निकले।
उन्होंने साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ (Naam Foundation) की स्थापना की। अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्होंने पीड़ित किसान परिवारों, विधवाओं और बच्चों की शिक्षा के लिए दान कर दिया। नदियों को गहरा करने, जल संरक्षण और गांवों को आत्मनिर्भर बनाने में उन्होंने जो भूमिका निभाई, उसने उन्हें एक अभिनेता से ऊपर उठाकर ‘जननायक’ बना दिया।
एक अपूरणीय शून्य
नाना पाटेकर का सादा जीवन, कुर्ता-पायजामा, मिट्टी से जुड़ाव और बेबाक सच कहने की आदत उन्हें भीड़ से अलग करती थी। वे कभी पुरस्कारों या प्रशंसा के मोहताज नहीं रहे; उन्होंने हमेशा अपनी शर्तों पर जिंदगी जी और उसी गरिमा के साथ विदा हुए।
उनका जाना केवल हिंदी या मराठी सिनेमा का नुकसान नहीं है, बल्कि उस आवाज़ का खो जाना है जो समाज के पाखंड पर खुलकर चोट करती थी। नाना पाटेकर भले ही भौतिक रूप से इस दुनिया को अलविदा कह गए हों, लेकिन उनकी अदाकारी, उनके कालजयी संवाद और किसानों के आंसुओं को पोंछने वाले उनके नेक काम भारत के जनमानस में सदैव अमर रहेंगे। भावभीनी श्रद्धांजलि!



