झीरम घाटी फैसले पर सियासी घमासान, भूपेश बघेल बोले- असली मास्टरमाइंड का पता चले; CM साय ने पूछा- सबूत थे तो NIA को क्यों नहीं दिए?

रायपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले के करीब 13 साल बाद NIA की विशेष अदालत के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ की सियासत गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अदालत के फैसले को आधा-अधूरा बताते हुए मामले में कथित साजिश और प्रशासनिक चूक की जांच की मांग की है। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए सवाल किया कि अगर कांग्रेस नेताओं के पास झीरम कांड से जुड़े ठोस सबूत थे, तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने क्यों नहीं रखा गया।
भूपेश बघेल ने उठाए कई सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि झीरम घाटी मामले में अभी कई अहम सवालों के जवाब सामने नहीं आए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री साय पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस ‘पर्ची’ की बात मुख्यमंत्री कर रहे थे, उसमें सवाल हैं कि आखिर झीरम कांड के कथित मास्टरमाइंड और उस समय के प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी।
बघेल ने कहा कि केवल नक्सलियों को दोषी ठहराने से मामले की पूरी सच्चाई सामने नहीं आएगी। उन्होंने तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों और घटना के समय सरेंडर कर चुके नक्सलियों से पूछताछ की मांग की है।
‘षड्यंत्र और प्रशासनिक चूक की भी हो जांच’
बघेल ने सवाल उठाया कि NIA की जांच में क्या हमले के पीछे कथित षड्यंत्र और प्रशासनिक चूक के पहलुओं की भी जांच हुई? उन्होंने यह भी पूछा कि FIR में जिन नक्सली नेताओं के नाम थे, बाद में उन्हें क्यों हटाया गया।
उन्होंने कहा कि झीरम घाटी में कांग्रेस की तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व मौजूद था, जिसमें नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा समेत कई नेताओं की हत्या हुई। बघेल ने सवाल किया कि इतने बड़े हमले के बावजूद मामले में केवल 10 आरोपियों को दोषी क्यों ठहराया गया और कथित बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका की जांच क्यों नहीं हुई।
‘मास्टरमाइंड कौन था?’
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जब भी कोई बड़ा नक्सली नेता पकड़ा या मारा जाता था, सरकार उसे किसी न किसी बड़े हमले का मास्टरमाइंड बताती थी। ऐसे में झीरम हमले का मास्टरमाइंड कौन था, यह अब तक स्पष्ट क्यों नहीं हुआ?
उन्होंने देवा और गुड्सा जैसे कथित नक्सली नेताओं का जिक्र करते हुए पूछा कि घटना के समय वे कहां थे और उनसे पूछताछ क्यों नहीं की गई। साथ ही उन्होंने प्रशासनिक चूक की जिम्मेदारी तय करने की भी मांग की।
CM साय का पलटवार- ‘सबूत थे तो NIA को देते’
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस के नेता पहले झीरम कांड से जुड़े सबूत अपनी जेब में होने की बात कहते थे। उन्होंने सवाल किया कि अगर उनके पास कोई ठोस सबूत था तो उसे जांच एजेंसी को क्यों नहीं सौंपा गया।
सीएम साय ने कहा कि NIA ने मामले की जांच की और अदालत ने 100 से अधिक गवाहों की गवाही सुनने के बाद फैसला सुनाया है। ऐसे में कांग्रेस को अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के बजाय उसका सम्मान करना चाहिए।
विजय शर्मा बोले- सबूत हैं तो जांच एजेंसी को सौंपें
डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास झीरम घाटी मामले से जुड़े कोई सबूत हैं तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने पेश करना चाहिए।
विजय शर्मा ने कहा कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ था और 27 मई को केंद्र सरकार ने मामले की जांच NIA को सौंप दी थी। उन्होंने कहा कि उस समय केंद्र में यूपीए सरकार थी और बाद के वर्षों में गिरफ्तारियां हुईं। शर्मा के मुताबिक, NIA की जांच के बाद ही अदालत में सुनवाई हुई और अब दोषियों को लेकर फैसला सामने आया है।
13 साल बाद आया अदालत का फैसला
झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में 5 सितंबर को जगदलपुर स्थित NIA की विशेष अदालत ने फैसला सुनाया। मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई हुई थी। इनमें से एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई, जबकि बाकी 10 आरोपियों के खिलाफ फैसला सुनाया गया।
अदालत ने सभी 10 आरोपियों को मामले में दोषी माना है। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों को 27 लोगों की हत्या और 15 लोगों की हत्या के प्रयास से जुड़ी धाराओं में दोषी पाया गया है। अदालत 16 सितंबर को दोषियों की सजा पर फैसला सुनाएगी।
क्या था झीरम घाटी हमला?
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के बाद नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला सुकमा से जगदलपुर की ओर लौट रहा था। काफिले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। झीरम घाटी पहुंचने पर नक्सलियों ने रास्ता रोककर काफिले पर हमला कर दिया।
इस हमले में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ल समेत कई लोगों की मौत हुई थी। हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसे छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नक्सली हमलों में गिना जाता है।
अब NIA अदालत के फैसले के बाद एक बार फिर इस मामले की जांच, कथित साजिश और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।



