पेपर लीक आंदोलन से उभरे, पेपर लीक विवाद में गई कुर्सी: धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर

नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। छात्र राजनीति के दौर में पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन से पहचान बनाने वाले प्रधान का राजनीतिक सफर लगभग तीन दशक तक लगातार आगे बढ़ता रहा। लेकिन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर उठे विवादों के बीच उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
राजनीतिक परिवार से मिली शुरुआत
धर्मेंद्र प्रधान का जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के तालचेर में हुआ। उनके पिता डॉ. देबेंद्र प्रधान अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके थे। उन्होंने तालचेर और उत्कल विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की और बाद में संबलपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। छात्र जीवन में ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और सक्रिय राजनीति की शुरुआत की।
1997 के पेपर लीक आंदोलन से मिली पहचान
साल 1997 में ओडिशा में परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने के बाद हुए छात्र आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में वे घायल हुए, लेकिन इस आंदोलन ने उन्हें राज्य के प्रमुख छात्र नेताओं में स्थापित कर दिया।
संगठन से संसद तक का सफर
साल 2000 में वे पहली बार विधायक बने और 2004 में लोकसभा पहुंचे। 2009 में चुनाव हारने के बाद उन्होंने संगठन में अहम जिम्मेदारियां संभालीं। भाजपा ने उन्हें विभिन्न राज्यों का चुनाव प्रभारी बनाया और राज्यसभा भी भेजा। ओडिशा में पार्टी के विस्तार में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
पेट्रोलियम मंत्री के रूप में बनाई अलग पहचान
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। लंबे समय तक इस मंत्रालय का नेतृत्व करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी (HELP) जैसी प्रमुख योजनाओं को आगे बढ़ाया। उज्ज्वला योजना के सफल क्रियान्वयन के कारण उन्हें ‘उज्ज्वला मैन’ के नाम से भी जाना गया।
2024 में वापसी और शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी
2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ओडिशा की संबलपुर सीट से जीत दर्ज की और मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में शिक्षा मंत्री बने। उनके सामने परीक्षा प्रणाली में सुधार और राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने की बड़ी चुनौती थी।
पेपर लीक विवाद बना सबसे बड़ी चुनौती
शिक्षा मंत्री रहते हुए NEET समेत कई परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने सरकार और NTA की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। इस मुद्दे को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और संसद से लेकर जंतर-मंतर तक उनके इस्तीफे की मांग उठी।
लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव और विवादों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने अंततः शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के साथ ही भारतीय राजनीति में लगभग तीन दशक लंबे एक महत्वपूर्ण अध्याय का नया मोड़ सामने आया।

