तीन घंटे का सफर, सीमित साधन और बड़ा सपना… गरीबी को मात देकर संजू देवी ने कबड्डी में रचा इतिहास

कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के छोटे से गांव केराकछार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कबड्डी के मंच तक पहुंचना आसान नहीं था। सीमित संसाधन, रोजाना लंबा सफर और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद संजू देवी ने कबड्डी को अपना सपना बनाया और लगातार मेहनत के दम पर भारतीय महिला कबड्डी टीम तक पहुंचीं। उनकी कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच अपने लक्ष्य को हासिल करने की मिसाल है।
2025 में बांग्लादेश में आयोजित महिला कबड्डी विश्व कप में संजू देवी भारतीय टीम का हिस्सा बनीं। फाइनल मुकाबले में भारत ने चीनी ताइपे को 35-28 से हराकर खिताब अपने नाम किया। इस मुकाबले में संजू ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अकेले 16 अंक हासिल किए। पूरे टूर्नामेंट में उनके प्रभावी प्रदर्शन के लिए उन्हें मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर यानी MVP चुना गया।
कोरबा के छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर
संजू देवी का संबंध कोरबा जिले के केराकछार गांव से है। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल में हुई। स्कूल के दिनों में ही उन्होंने कबड्डी खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे इस खेल के प्रति उनकी रुचि बढ़ती गई और कबड्डी उनके जीवन का लक्ष्य बन गई।
संजू का परिवार साधारण आर्थिक परिस्थितियों से गुजरा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके पिता खेती और दिहाड़ी मजदूरी से जुड़े रहे हैं। ऐसे माहौल में खेल के लिए जरूरी संसाधन जुटाना आसान नहीं था। इसके बावजूद संजू ने आर्थिक परेशानियों को अपनी राह की रुकावट नहीं बनने दिया।
रोज तीन घंटे का सफर, फिर भी नहीं रुका अभ्यास
संजू के शुरुआती खेल जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों में प्रशिक्षण के लिए रोजाना किया जाने वाला लंबा सफर शामिल था। गांव से कोरबा तक आने-जाने में करीब तीन घंटे तक का समय लग जाता था।
इतने लंबे सफर के बावजूद उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। उनकी प्रतिभा पर शुरुआती दौर में कोरबा जिला कबड्डी संघ से जुड़े अनुज प्रताप सिंह की नजर पड़ी। उन्होंने संजू को प्रशिक्षण और आगे बढ़ने का अवसर दिया।
इसके बाद संजू का चयन बिलासपुर के बहतराई स्थित बालिका आवासीय कबड्डी अकादमी में हुआ। यहीं से उनके खेल करियर को एक नया मोड़ मिला।
बहतराई अकादमी में निखरी प्रतिभा
बहतराई की कबड्डी अकादमी संजू देवी के करियर का अहम पड़ाव रही। यहां उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और खेल सुविधाएं मिलीं। कोच दिल कुमार राठौर के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने खेल की बारीकियों पर काम किया।
नियमित अभ्यास, फिटनेस और लगातार प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से उनके प्रदर्शन में सुधार आता गया। गांव से शुरू हुआ उनका सफर अब जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं से आगे बढ़कर विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने लगा।
यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट से इंडिया कैंप तक
संजू देवी ने बिलासपुर विश्वविद्यालय की ओर से ईस्ट जोन इंटर यूनिवर्सिटी और ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इसके अलावा उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में भी अपना प्रदर्शन दिखाया।
2024 में छत्तीसगढ़ कबड्डी संघ की चयन स्पर्धा में उनके प्रदर्शन के बाद उन्हें इंडिया कैंप के लिए चुना गया। यह उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
इंडिया कैंप में अच्छे प्रदर्शन के बाद उनके लिए भारतीय टीम का रास्ता खुला और घरेलू स्तर पर लगातार प्रदर्शन का फायदा उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मिला।
ईरान में एशियन चैंपियनशिप का अनुभव
मार्च 2025 में ईरान में आयोजित सीनियर महिला एशियन कबड्डी चैंपियनशिप में संजू देवी भारतीय टीम का हिस्सा रहीं। भारतीय टीम ने प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया।
इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने से संजू को बड़े मंच का अनुभव मिला। उनका आत्मविश्वास बढ़ा और इसके बाद उसी साल महिला कबड्डी विश्व कप के लिए भी उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली।
विश्व कप फाइनल में 16 अंक और MVP का खिताब
संजू देवी के करियर का सबसे बड़ा पड़ाव 2025 का महिला कबड्डी विश्व कप रहा।
बांग्लादेश में आयोजित इस टूर्नामेंट के फाइनल में भारत का सामना चीनी ताइपे से हुआ। भारतीय टीम ने मुकाबला 35-28 से जीतकर विश्व कप का खिताब अपने नाम किया।
इस फाइनल में संजू देवी ने शानदार प्रदर्शन किया और भारतीय टीम के कुल 35 अंकों में से 16 अंक अकेले संजू ने हासिल किए। उनकी रेडिंग ने मैच में भारत को महत्वपूर्ण बढ़त दिलाने में योगदान दिया।
पूरे टूर्नामेंट में लगातार प्रभावी प्रदर्शन के बाद संजू को MVP यानी मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर चुना गया।
विश्व कप के बाद बढ़ी पहचान
विश्व कप में MVP बनने के बाद संजू देवी की पहचान सिर्फ छत्तीसगढ़ की खिलाड़ी तक सीमित नहीं रही। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनके प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय महिला कबड्डी की चर्चित खिलाड़ियों में शामिल किया।
खास बात यह रही कि उन्होंने अपना सफर किसी बड़े शहर या अत्याधुनिक खेल सुविधा से नहीं, बल्कि कोरबा के एक छोटे से गांव से शुरू किया था।
2026 एशियन गेम्स में भी भारतीय टीम का हिस्सा
विश्व कप की सफलता के बाद संजू देवी का अंतरराष्ट्रीय सफर आगे भी जारी रहा। उन्हें 2026 एशियन गेम्स के लिए भारतीय महिला कबड्डी टीम में जगह मिली।
सितंबर 2026 में जापान के आइची-नागोया में आयोजित खेलों में भारत ने अपने अभियान की शुरुआत बांग्लादेश के खिलाफ 42-21 की जीत के साथ की। इस मुकाबले में भी संजू ने भारतीय टीम के आक्रमण में योगदान दिया।
इस तरह विश्व कप 2025 की सफलता के बाद संजू लगातार भारतीय टीम के साथ बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नजर आईं।
छत्तीसगढ़ सरकार ने 50 लाख रुपये से किया सम्मानित
विश्व कप में शानदार प्रदर्शन और भारत को खिताब दिलाने में योगदान के बाद संजू देवी को छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से 50 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि से सम्मानित किया गया।
अप्रैल 2026 में उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने उन्हें यह राशि प्रदान की। सरकार की ओर से मिला यह सम्मान संजू के खेल करियर की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि बना।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
संजू देवी की कहानी बताती है कि खेल में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ प्रतिभा ही पर्याप्त नहीं होती। नियमित अभ्यास, अनुशासन, सही मार्गदर्शन और लगातार बेहतर प्रदर्शन भी जरूरी है।
गांव से कोरबा तक रोजाना लंबा सफर तय करने वाली संजू ने पहले जिला और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन किया, इंडिया कैंप तक पहुंचीं और फिर भारतीय महिला कबड्डी टीम का हिस्सा बनीं।
इसके बाद एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक, विश्व कप का खिताब और MVP का सम्मान उनके करियर की बड़ी उपलब्धियां बन गईं।
छोटे शहर और गांव के खिलाड़ियों के लिए मिसाल
संजू देवी का सफर उन युवाओं के लिए खास मायने रखता है, जो छोटे गांवों और शहरों से खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं।
सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा और सही अवसर मिलने पर अपनी प्रतिभा को साबित किया। कोरबा के केराकछार गांव से शुरू हुआ उनका सफर अब भारतीय कबड्डी टीम और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंच चुका है।
विश्व कप MVP का खिताब, एशियन चैंपियनशिप का स्वर्ण और 2026 एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व—संजू देवी का सफर बताता है कि बड़ा सपना देखने के लिए बड़ा शहर नहीं, बल्कि बड़ी मेहनत जरूरी है।



