Sukma Flood: बाढ़ उतरने के बाद भी संकट बरकरार, 200 मकान ढहे, 260 से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त, 600 एकड़ धान की फसल बर्बाद

सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब तबाही की तस्वीर सामने आने लगी है। डोंगाघाट से भेजापदर तक कई गांवों में बाढ़ ने लोगों के घरों, घरेलू सामान और खेतों को भारी नुकसान पहुंचाया है। हालात ऐसे हैं कि कहीं मकान पूरी तरह धराशायी हो चुके हैं, तो कहीं घरों की दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। खेतों में पानी और कीचड़ जमा होने से धान की फसल बर्बाद हो रही है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में करीब 200 मकान ढह गए हैं, जबकि 260 से अधिक घरों को नुकसान पहुंचा है। वहीं, छेपड़ागुड़ा में लगभग 600 एकड़ धान की फसल बर्बाद होने की जानकारी सामने आई है।
पत्रिका की टीम ने डोंगाघाट, छेपड़ागुड़ा, भेजापदर, नदीबोड़ना और नारायणपाल जैसे बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा कर जमीनी हालात का जायजा लिया। गांवों में पहुंचने पर सबसे पहले नजर उन मकानों पर पड़ती है, जो कभी परिवारों का आशियाना हुआ करते थे। अब कहीं सिर्फ दीवारें बची हैं, तो कहीं छत पूरी तरह जमीन पर आ चुकी है। घरों के आंगन में जमा कीचड़ और भीतर बिखरा सामान बाढ़ की भयावहता बयां कर रहा है।
मकानों में दरारें, कर्ज लेकर बनाए घरों पर भी संकट
बाढ़ ने कई परिवारों के घरों को इतना नुकसान पहुंचाया है कि अब उनके लिए वहां रहना भी सुरक्षित नहीं रह गया है। सुमित्रा बघेल के मकान में बाढ़ के बाद दरारें आ गई हैं। घर का सामान भी खराब हो चुका है। उन्होंने बैंक से कर्ज लेकर अपना मकान बनाया था। अब घर को हुए नुकसान के बाद उनके सामने आर्थिक परेशानी के साथ-साथ सुरक्षित रहने की चिंता भी खड़ी हो गई है।
सुमित्रा की तरह सुधरु राम कश्यप, कमला बूटी, गुड़िया विक्रम, चमेली कश्यप, मेघनाथ बघेल, जैमिनी नाग, सोनामन बघेल, कोयली मौर्य, दशमती बघेल और लालचंद बघेल समेत कई परिवार बाढ़ की मार झेल रहे हैं। किसी के घर की दीवारें क्षतिग्रस्त हुई हैं, तो किसी का घरेलू सामान पूरी तरह खराब हो गया है। कई परिवारों के सामने अब मकान की मरम्मत और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती है।
किसी का अनाज बहा, किसी की बच्चों की किताबें खराब
बाढ़ का पानी घरों में घुसने से लोगों का घरेलू सामान भी बर्बाद हो गया। प्रेमधान बघेल, दायधान बघेल, धनमती, सलीमराजू बघेल, जीतूराम, जेठूराम और सबीर सुरु समेत कई परिवारों को नुकसान उठाना पड़ा है। घरों में रखा अनाज, कपड़े और अन्य जरूरी सामान पानी में खराब हो गया। कुछ परिवारों के बच्चों की किताबें और पढ़ाई से जुड़ी सामग्री भी बाढ़ की चपेट में आ गई।
सोमारू नाग और मोआसी नाग बताते हैं कि पानी के तेज बहाव में घर का सामान बह गया। अब परिवार दिन में घरों की सफाई और बचा हुआ सामान समेटने में जुटे रहते हैं, जबकि रात सुरक्षित जगह पर गुजारनी पड़ती है। कुछ परिवारों के लिए लग्न वाटिका ही फिलहाल रात बिताने का ठिकाना बन गई है।
बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी लोगों की परेशानी कम नहीं हुई है। घरों में जमा कीचड़ साफ करना, खराब सामान हटाना और रहने लायक जगह तैयार करना प्रभावित परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जिनके मकान पूरी तरह ढह गए हैं, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल रहने की व्यवस्था का है।
छेपड़ागुड़ा में 600 एकड़ धान की फसल बर्बाद
बाढ़ का असर सिर्फ गांवों के मकानों तक सीमित नहीं है। खेतों में भी तबाही के निशान साफ दिखाई दे रहे हैं। डोंगाघाट और महारापारा के बाद छेपड़ागुड़ा में भी बाढ़ से भारी नुकसान हुआ है। ग्रामीणों के मुताबिक यहां करीब 600 एकड़ धान की फसल बर्बाद हो गई है।
लक्ष्मण कश्यप बताते हैं कि सुबह करीब 4 बजे पानी घरों में घुसना शुरू हुआ। कुछ ही देर में पानी का स्तर बढ़ गया और आसपास के खेत भी जलमग्न हो गए। उनकी करीब 1.30 एकड़ धान की फसल बर्बाद हो गई। जिस फसल से परिवार को आमदनी की उम्मीद थी, वह अब पानी और कीचड़ में खराब हो रही है।
किसानों के लिए यह नुकसान बेहद गंभीर है। धान की खेती में महीनों की मेहनत, बीज, खाद और अन्य संसाधन लगते हैं। फसल बर्बाद होने से उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ेगा। जिन किसानों ने खेती के लिए कर्ज लिया है, उनके सामने कर्ज चुकाने की चिंता भी बढ़ सकती है।
पानी उतरने के बाद अब राहत और पुनर्वास की चुनौती
सुकमा के बाढ़ प्रभावित गांवों में हालात यह बता रहे हैं कि प्राकृतिक आपदा का असर पानी उतरने के बाद भी लंबे समय तक बना रहता है। मकानों की मरम्मत, घरेलू सामान की भरपाई, सुरक्षित आवास और फसल नुकसान का आकलन अब सबसे अहम जरूरत बन गए हैं।
डोंगाघाट, छेपड़ागुड़ा, भेजापदर, नदीबोड़ना और नारायणपाल जैसे गांवों में प्रभावित परिवारों की स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है। जिन मकानों में दरारें आ गई हैं, उनकी सुरक्षा की जांच और जिनके घर पूरी तरह ढह गए हैं, उनके लिए रहने की व्यवस्था अहम है। वहीं, किसानों को हुए नुकसान का आकलन कर उचित राहत उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा।
बाढ़ का पानी भले ही उतर गया हो, लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। किसी का घर उजड़ गया है, किसी का घरेलू सामान बह गया है, तो किसी की महीनों की मेहनत से तैयार हो रही धान की फसल बर्बाद हो गई है। अब इन गांवों के लोगों की उम्मीद राहत, मुआवजे और पुनर्वास से जुड़ी है।



