दुनिया के सबसे अमीर 0.1% लोग फैलाते हैं गरीब 44% आबादी से ज्यादा कार्बन प्रदूषण, ऑक्सफैम की रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन पर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी और नुकसान का बोझ सभी पर समान नहीं है। कहीं भीषण गर्मी जानलेवा साबित हो रही है, तो कहीं बाढ़ और सूखे से घरों, खेतों और आजीविका को नुकसान पहुंच रहा है। ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे अमीर लोगों का कार्बन उत्सर्जन गरीब आबादी की तुलना में कहीं अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों का कार्बन उत्सर्जन सबसे गरीब 44 प्रतिशत आबादी के कुल उत्सर्जन से भी ज्यादा है। यह आंकड़ा बताता है कि जलवायु संकट केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक असमानता से भी गहराई से जुड़ा है।
करीब 80 लाख अमीर लोगों का उत्सर्जन 350 करोड़ लोगों से ज्यादा
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के करीब 80 लाख बेहद अमीर लोगों का कार्बन उत्सर्जन लगभग 350 करोड़ लोगों के संयुक्त उत्सर्जन से अधिक है। वहीं, दुनिया की कुल संपत्ति का करीब 19 प्रतिशत हिस्सा सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों के पास है।
जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले गरीब परिवारों के पास अक्सर आपदाओं के बाद दोबारा जीवन शुरू करने के लिए पर्याप्त बचत, बीमा या सुरक्षित आवास नहीं होता। ऐसे में बाढ़, सूखा और गर्मी उनके लिए आर्थिक संकट को और गंभीर बना देते हैं।
निजी विमान और आलीशान जीवनशैली भी बड़ी वजह
रिपोर्ट के मुताबिक, अमीर लोगों की जीवनशैली और निवेश दोनों कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। निजी विमान, बड़ी गाड़ियां, आलीशान घर और अधिक ऊर्जा की खपत करने वाली सुविधाएं उनके कार्बन फुटप्रिंट को बढ़ाती हैं।
इसके अलावा, तेल, गैस और कोयले जैसे प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में निवेश भी जलवायु संकट को बढ़ावा देता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया के निजी विमान महज दो सेकंड में उतना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर देते हैं, जितना दुनिया की सबसे गरीब आधी आबादी पूरे एक साल में करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में निजी विमानों से करीब 1.6 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ। दुनिया में लगभग 2.50 लाख लोग निजी विमानों का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि, जलवायु परिवर्तन के लिए केवल अमीरों की जीवनशैली जिम्मेदार नहीं है। बिजली उत्पादन, उद्योग, परिवहन और कृषि जैसी गतिविधियां भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान देती हैं।
जलवायु संकट की सबसे बड़ी कीमत गरीब क्यों चुकाते हैं?
जलवायु परिवर्तन का असर गरीब परिवारों पर अधिक पड़ता है, क्योंकि उनके पास नुकसान से उबरने के संसाधन सीमित होते हैं। फसलें खराब होने से उनकी आय प्रभावित होती है, जबकि खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ जाता है।
रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोगों में से प्रत्येक के सालाना कार्बन उत्सर्जन से भविष्य में गर्मी से जुड़ी करीब 19 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अधिक असमानता वाले देशों में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या कम असमानता वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु संकट के कारण वर्ष 2050 तक दुनिया में करीब एक अरब लोगों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इसका असर विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देशों में रहने वाले लोगों पर पड़ने की आशंका जताई गई है।
प्रदूषण फैलाने के बाद आपदाओं से भी मुनाफा?
ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि कुछ कंपनियां प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से कमाई करने के साथ-साथ आपदाओं के बाद राहत और पुनर्निर्माण से जुड़े कारोबार से भी लाभ उठा सकती हैं।
रिपोर्ट के नए ‘डिस्ट्रॉय एंड रीबिल्ड इंडेक्स’ में 217 ऐसी कंपनियों की पहचान की गई है, जिनका कारोबार प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन, राहत और पुनर्निर्माण से भी जुड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों ने 2025 में औसतन 1.8 अरब डॉलर की कमाई की और अपने शेयरधारकों को औसतन एक अरब डॉलर से अधिक का भुगतान किया।
ऑक्सफैम का अनुमान है कि आपदाओं से उबरने और पुनर्निर्माण का वैश्विक बाजार वर्ष 2029 तक बढ़कर सालाना 92 अरब डॉलर का हो सकता है।
जलवायु न्याय की मांग तेज
रिपोर्ट का मुख्य संदेश है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है। जिन लोगों और कंपनियों का कार्बन उत्सर्जन अधिक है, उनकी भूमिका पर ध्यान देना और आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब समुदायों को सहायता देना इस चुनौती से निपटने के अहम कदम हो सकते हैं।



