संसद का विशेष सत्र इसी महीने संभव, लोकसभा सीटें बढ़ाने की तैयारी तेज
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर फिर बढ़ी हलचल; अप्रैल में संविधान संशोधन बिल पर नहीं मिला था दो-तिहाई बहुमत

दिल्ली। लोकसभा ( Parliament) सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने से जुड़े प्रस्तावों पर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय होती नजर आ रही है। इन मुद्दों पर चर्चा के लिए इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, सरकार की ओर से अब तक सत्र की तारीख या एजेंडे को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। संभावित सत्र को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस बार संविधान संशोधन के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाएगी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। इसके लिए संसद में नए सिरे से संख्या बल जुटाने की कोशिश की जा सकती है।
इससे पहले अप्रैल में सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया था, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था। इसके चलते इससे जुड़े अन्य विधेयकों पर भी आगे की कार्रवाई नहीं हो सकी थी।
अप्रैल में अटक गया था सरकार का प्रस्ताव
इस साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित तीन विधेयक संसद में पेश किए थे। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक शामिल थे। इन प्रस्तावों का उद्देश्य लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था।
संविधान संशोधन विधेयक ( Parliament) को पारित कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत विशेष बहुमत की जरूरत थी। सामान्य विधेयकों की तरह केवल सदन में मौजूद सदस्यों के साधारण बहुमत से इसे पारित नहीं कराया जा सकता। लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिलने के कारण सरकार का प्रयास सफल नहीं हो सका। इसके बाद परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेश कानून में संशोधन से जुड़े विधेयकों की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ पाई।
अब संभावित विशेष सत्र की चर्चा के बीच सरकार के सामने वही चुनौती दोबारा खड़ी है। विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए उसे विपक्षी दलों और अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल करना होगा।
दो-तिहाई बहुमत जुटाने पर नजर
विशेष सत्र की संभावनाओं के बीच सरकार की रणनीति को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार डीएमके (DMK) समेत कुछ क्षेत्रीय और छोटे दलों से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, इन प्रयासों के नतीजों और जरूरी बहुमत जुटने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
संविधान संशोधन से जुड़े किसी विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना सरकार के लिए अहम होगा। सामान्य विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया में अंतर है। ऐसे में सरकार को केवल सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की जरूरत पड़ सकती है।
परिसीमन का मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी है। लोकसभा सीटों के पुनर्गठन से अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से इस विषय पर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच चर्चा की मांग उठती रही है।
खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन प्रस्तावों पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। खड़गे का कहना है कि परिसीमन से संबंधित किसी नए संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ चर्चा की जानी चाहिए।
उन्होंने अप्रैल में लाए गए विधेयक का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक सहमति बनाने की जरूरत है। विपक्ष की मांग है कि सरकार विधेयक की रूपरेखा, उसके संभावित प्रभाव और राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों पर पहले राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श करे।
सर्वदलीय बैठक की मांग से संकेत मिलता है कि परिसीमन और महिला आरक्षण का विषय केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और संवैधानिक पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। यदि सरकार विशेष सत्र बुलाती है, तो इन मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष के बीच चर्चा तेज होने की संभावना है।
मानसून सत्र के सत्रावसान पर भी सवाल
खड़गे ने संसद ( Parliament) के मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं होने को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, 13 अगस्त को मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के 64 दिन बाद भी लोकसभा और राज्यसभा का सत्रावसान नहीं हुआ था। उन्होंने इसे असामान्य स्थिति बताते हुए सरकार से संसदीय प्रक्रिया और परिसीमन प्रस्तावों पर स्पष्टता देने की मांग की है।
सत्र के स्थगन और सत्रावसान में अंतर होता है। सदन की बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी सत्रावसान की औपचारिक प्रक्रिया अलग से पूरी की जाती है। ऐसे में इस मुद्दे को लेकर उठे सवालों के बीच संभावित विशेष सत्र की चर्चा ने राजनीतिक गतिविधियां बढ़ा दी हैं।
लोकसभा सीटें और महिला आरक्षण क्यों अहम?
परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से जुड़े ढांचे का पुनर्गठन है। इसके जरिए लोकसभा सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों के स्वरूप में बदलाव का रास्ता तैयार हो सकता है। महिला आरक्षण का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। इसे लागू करने की प्रक्रिया परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ी हुई है।
इन प्रस्तावों पर आगे बढ़ने के लिए सरकार को संवैधानिक और विधायी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। साथ ही, राज्यों के प्रतिनिधित्व, सीटों के संभावित पुनर्वितरण और आरक्षण लागू करने की व्यवस्था जैसे विषयों पर राजनीतिक सहमति भी महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल संसद के विशेष सत्र को लेकर कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में सत्र इसी महीने बुलाया जाएगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन अप्रैल में विधेयक के अटकने के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण पर दोबारा बढ़ी हलचल ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम, विपक्ष की प्रतिक्रिया और संविधान संशोधन के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की रणनीति पर है।



