PM मोदी ने देशवासियों को दी विजयादशमी की शुभकामनाएं, भगवान राम को बताया धर्म का साक्षात स्वरूप
एक्स पर साझा किया वाल्मीकि रामायण का संस्कृत श्लोक, बोले- विजय का पर्व हर किसी के संकल्प को नई शक्ति दे

दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( PM Modi) ने मंगलवार को विजयादशमी के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कामना की कि उल्लास और विश्वास का यह पर्व हर व्यक्ति के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे और सभी के जीवन में सुख, सौभाग्य तथा सफलता लेकर आए।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भगवान श्रीराम की स्तुति में संस्कृत का एक सुभाषित भी साझा किया। यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि की रचना ‘वाल्मीकि रामायण’ से लिया गया है, जिसमें भगवान राम को धर्म का साक्षात स्वरूप, सत्यपराक्रमी और समस्त लोकों का रक्षक बताया गया है।
PM Modi के संदेश में विजयादशमी के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ भगवान राम के आदर्शों का उल्लेख भी प्रमुखता से सामने आया। दशहरा बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। भगवान राम के जीवन और उनके आचरण से जुड़े आदर्श इस पर्व के मूल भाव को दर्शाते हैं।
पीएम मोदी ने कहा- संकल्पों को नई शक्ति दे विजय पर्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( PM Modi) ने एक्स पर अपने शुभकामना संदेश में लिखा, “आप सभी को विजयादशमी की अनंत शुभकामनाएं। उल्लास और विश्वास का यह विजय पर्व हर किसी के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे। सभी का जीवन सुख-सौभाग्य और सफलता से समृद्ध हो, यही कामना है।”
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश के जरिए देशवासियों के सुख, समृद्धि और सफलता की कामना की। विजयादशमी को नई शुरुआत और दृढ़ संकल्प का पर्व भी माना जाता है। इस दिन लोग अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने, बुराइयों से दूर रहने और अच्छे कार्यों के लिए प्रतिबद्ध होने का संकल्प लेते हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी विभिन्न परंपराओं के साथ मनाई जाती है। कहीं रावण दहन के आयोजन होते हैं, तो कहीं शस्त्र पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से पर्व मनाया जाता है। इन सभी परंपराओं का केंद्रीय संदेश धर्म, सत्य और सदाचार की जीत से जुड़ा है।
भगवान राम की स्तुति में साझा किया संस्कृत सुभाषित
प्रधानमंत्री ने अपने दूसरे संदेश में संस्कृत का यह श्लोक साझा किया:
“रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥”
इसका भावार्थ है कि भगवान श्रीराम धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। वे सज्जनों के आश्रयदाता, सत्य के प्रति प्रतिबद्ध और सत्यपराक्रम से युक्त हैं। वे समस्त लोकों के ऐसे राजा हैं, जो उसी प्रकार उनका पालन और संरक्षण करते हैं, जैसे देवराज इंद्र देवलोक के अधिपति और रक्षक हैं।
यह श्लोक भगवान राम के व्यक्तित्व के उन गुणों को सामने लाता है, जिन्हें भारतीय परंपरा में आदर्श जीवन के आधार के रूप में देखा जाता है। इसमें उनके धर्मपालन, सत्यनिष्ठा, पराक्रम और लोककल्याणकारी नेतृत्व का वर्णन है।
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह सुभाषित वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के 37वें सर्ग का 13वां श्लोक है। रामायण के इस प्रसंग में भगवान राम के चरित्र और उनके गुणों का वर्णन किया गया है।
राम के जीवन में धर्म केवल उपदेश नहीं, आचरण था
श्लोक का प्रमुख संदेश यह है कि धर्म केवल नियमों और सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे जीवन में अपनाना भी जरूरी है। भगवान राम का चरित्र इसी विचार का उदाहरण माना जाता है। उन्होंने पुत्र, भाई, मित्र और राजा के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मर्यादा और कर्तव्य को महत्व दिया।
रामायण के विभिन्न प्रसंगों में भगवान राम को कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का पालन करने वाले आदर्श पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है। वनवास स्वीकार करना, पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना उनके चरित्र के प्रमुख उदाहरण माने जाते हैं।
अरण्यकांड में ऋषियों और वनवासियों की सुरक्षा का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। राक्षसों के अत्याचार से परेशान ऋषियों की रक्षा करना और धर्म की स्थापना के लिए आगे बढ़ना भगवान राम के कर्तव्यबोध को दर्शाता है। इस संदर्भ में उन्हें धर्म के साकार रूप के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।
लोककल्याणकारी शासन का भी देता है संदेश
सुभाषित की अंतिम पंक्ति में भगवान राम की तुलना देवराज इंद्र से की गई है। इसके माध्यम से उनके नेतृत्व और संरक्षण की भूमिका को रेखांकित किया गया है। जिस प्रकार इंद्र को देवलोक का अधिपति और रक्षक माना जाता है, उसी प्रकार भगवान राम को समस्त लोकों के पालनकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इसका भाव यह भी है कि आदर्श नेतृत्व की पहचान केवल अधिकार या शक्ति से नहीं, बल्कि न्याय, कर्तव्य और प्रजा के कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता से होती है। भगवान राम का चरित्र भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में इसी आदर्श से जुड़ा हुआ है।
विजयादशमी के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी की शुभकामनाओं और रामायण के इस श्लोक के जरिए सत्य, धर्म, संकल्प और लोककल्याण के संदेश को रेखांकित किया गया। यह पर्व लोगों को बुराइयों से दूर रहने, अपने कर्तव्यों का पालन करने और सकारात्मक उद्देश्यों के लिए निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा देता है।



