Chhattisgarh

बस्तर में ‘ऑपरेशन खजाना’: सैटेलाइट और रडार से ढूंढे जा रहे नक्सलियों के गुप्त तहखाने

नक्सलवाद के अंत की ओर निर्णायक कदम: 8 करोड़ की बरामदगी और 'ऑपरेशन खजाना' की इनसाइड स्टोरी

हाई-टेक हुआ एंटी-नक्सल ऑपरेशन, बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के छिपे हथियारों और नकदी पर हाई-टेक स्ट्राइक

कहते हैं- जंगल का राज हमेशा जमीन के नीचे नहीं दबा रहता, कभी न कभी वह बाहर आ ही जाता है। यह बात छत्तीसगढ़ के बस्तर में बिल्कुल सच साबित हो रही है, जहां से एक बेहद बड़ा और चौंकाने वाला अभियान सामने आया है। दशकों से चले आ रहे नक्सलवाद के कमजोर पड़ते नेटवर्क के बीच अब सुरक्षा बलों ने एक नया और निर्णायक मिशन शुरू किया है, जिसे नाम दिया गया है- ‘ऑपरेशन खजाना’।

इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य बस्तर के घने जंगलों में जमीन के भीतर छिपे नक्सलियों के उन गुप्त ठिकानों (डंप) को खोजना और नष्ट करना है, जहां उन्होंने भारी मात्रा में हथियार, विस्फोटक और नकदी छिपा कर रखी है।

पारंपरिक सर्चिंग की जगह ली हाई-टेक तकनीक ने

वर्तमान में इलाके में नक्सल गतिविधियां भले ही कमजोर हुई हों, लेकिन उनके द्वारा पहले से छिपाकर रखे गए ये डंप सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इन्हीं छिपे हुए ठिकानों को ढूंढने के लिए अब पारंपरिक सर्चिंग के बजाय पूरी तरह से आधुनिक और टेक्नोलॉजी आधारित तरीका अपनाया गया है।

इस हाई-टेक सर्च ऑपरेशन में इन तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है:

सैटेलाइट इमेजिंग: इसके जरिए अंतरिक्ष आधारित निगरानी प्रणाली से जंगलों के चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है।

ड्रोन सर्विलांस: ड्रोन लगातार इलाके की थर्मल गतिविधियों और भौगोलिक बदलावों को रिकॉर्ड कर रहे हैं।

ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR): जमीन के अंदर की परतों को गहराई तक स्कैन करने के लिए इन विशेष रडार सिस्टम का उपयोग हो रहा है।

मेटल डिटेक्शन उपकरण: संदिग्ध बिंदुओं पर सटीक जानकारी जुटाने के लिए मेटल डिटेक्टर टीमों को तैनात किया गया है।

क्या थी नक्सलियों की ‘डंप’ रणनीति?

सुरक्षा बलों की जांच में यह बात सामने आई है कि नक्सली इन डंप को बेहद सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से छिपाते थे। इनके निर्माण में कई परतें होती थीं मसलन

ऊपरी सतह: इसे प्राकृतिक रूप देने के लिए मिट्टी, घास और कांटे बिछाए जाते थे ताकि किसी को शक न हो।

सुरक्षा परत: इसके ठीक नीचे विस्फोटकों (IEDs) का जाल बिछाया जाता था, ताकि यदि कोई इसे खोलने की कोशिश करे तो धमाका हो जाए।

निचला स्तर: सबसे नीचे सुरक्षित रूप से पैक किए गए हथियार, गोला-बारूद और नकदी रखी जाती थी।

इन सभी ठिकानों की पहचान के लिए नक्सली खास कोड-आधारित सिस्टम का इस्तेमाल करते थे, जिसे बाहरी व्यक्ति या सुरक्षा बलों के लिए डिकोड कर पाना बेहद मुश्किल होता था।

करोड़ों की बरामदगी और ऑपरेशन की सफलता

हाल ही में सामने आए कुछ मामलों और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से मिली खुफिया जानकारी के बाद, बस्तर के जंगलों में ऐसे 22 छिपे हुए लोकेशंस की पहचान की गई है। सुरक्षा बलों की अलग-अलग यूनिट्स और तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर इन इलाकों की खाक छान रहे हैं। पिछले तीन महीनों में चलाए गए इस सघन सर्च ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता हाथ लगी है। अब तक लगभग 8 करोड़ रुपये मूल्य के हथियार, खतरनाक विस्फोटक और नकदी बरामद की जा चुकी है।

भविष्य के खतरे को जड़ से खत्म करने की तैयारी

सुरक्षा एजेंसियों का स्पष्ट मानना है कि यदि इन छिपे हुए संसाधनों (हथियार और फंड) को नष्ट नहीं किया गया, तो भविष्य में नक्सली इसका इस्तेमाल दोबारा किसी हिंसक गतिविधि या खुद को पुनर्जीवित करने के लिए कर सकते हैं। इसलिए ‘ऑपरेशन खजाना’ के तहत इन डंप्स को पूरी तरह से खत्म करना बेहद जरूरी है।

फिलहाल, सुरक्षा बलों की टीमें अंतिम डंप लोकेशन की तलाश में अपनी सर्चिंग तेज कर चुकी हैं और बस्तर के जंगलों में यह महा-अभियान लगातार जारी है। ‘ऑपरेशन खजाना’ सिर्फ एक सर्च अभियान नहीं, बल्कि नक्सलवाद की बची-खुची जड़ों को उखाड़ फेंकने का एक निर्णायक प्रहार है।

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