Chhattisgarh

जन-आकांक्षाओं का स्व-मूल्यांकन और सुशासन की जमीनी कसौटी

6 लाख से अधिक आवेदन, भरोसा और अपेक्षाओं का बड़ा संकेत

छत्तीसगढ़। राज्य की प्रशासनिक और राजनैतिक फिजा में बीते 40 दिनों से जारी ‘सुशासन(Good Governance) तिहार’ केवल एक शासकीय आयोजन भर नहीं था, बल्कि यह सत्ता और समाज के बीच सीधे संवाद का एक सघन लोकतान्त्रिक प्रयोग था। 1 मई से 10 जून की अवधि में आयोजित इन शिविरों के माध्यम से सरकार ने न केवल अपनी योजनाओं की पहुंच को टटोला, बल्कि अपनी जन-छवि का एक व्यावहारिक ‘ऑडिट’ भी किया। लोकतंत्र में जब कोई सरकार अपने कार्यकाल के एक पड़ाव पर जनता के द्वार तक जाती है, तो उसके पीछे केवल तात्कालिक समस्याओं का निवारण नहीं होता, बल्कि जनमानस में पल रही संतुष्टि और असंतोष के सूक्ष्म संकेतों को पढ़ने की गहरी राजनैतिक अभिलाषा भी होती है।

26 हजार शिकायतें, बाकी मांगें, विकास की तेज होती धड़कन

इन चालीस दिनों के भीतर प्राप्त 6 लाख से अधिक आवेदन इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि व्यवस्था और नागरिक के बीच संवाद की खिड़कियां कितनी आवश्यक हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से महज 26 हजार के करीब ही शिकायतें हैं, जबकि शेष सारे आवेदन मांग आधारित हैं। आंकड़ों का यह अनुपात शासन के लिए दोहरे संदेश समेटे हुए है। पहला यह कि वर्तमान तंत्र के प्रति जनता में एक बुनियादी भरोसा है, जिसके कारण वे अपनी आवश्यकताओं (मांगों) को लेकर सरकार के सम्मुख आ रहे हैं। दूसरा संदेश यह है कि विकास की गति को लेकर आम जन में अपेक्षाएं तीव्र हैं। जनसाधारण जब किसी व्यवस्था से ‘मांग’ करता है, तो वह व्यवस्था की क्षमता पर विश्वास प्रकट कर रहा होता है; लेकिन जब यही मांगें दीर्घकाल तक लंबित रह जाती हैं, तो वे धीरे-धीरे तीखी ‘शिकायतों’ और अंततः राजनीतिक ‘नाराजगी’ में तब्दील हो जाती हैं।

नेताओं की मौजूदगी से बढ़ी जवाबदेही

इस सुशासन(Good Governance) तिहार का एक और विशिष्ट पहलू सत्तापक्ष के कद्दावर नेताओं की उपस्थिति और शिविरों में नौकरशाही की जवाबदेही तय करने का आक्रामक अंदाज रहा। जनसाधारण के समक्ष अफसरों को फटकार लगाने और जनसमस्याओं पर त्वरित संवेदनशीलता दिखाने के दृश्यों ने निश्चित रूप से आम आदमी को एक मनोवैज्ञानिक संबल दिया। यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि संप्रभुता अंततः जनता में निहित है और प्रशासनिक तंत्र उसकी सेवा के लिए उत्तरदायी है। हालांकि, इस लोक-लुभावन प्रशासनिक शैली के समानांतर एक नीतिगत आत्मचिंतन भी आवश्यक है। क्या प्रशासनिक सजगता और संवेदनशीलता के लिए सदैव शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व के दबाव या ऐसे विशेष अभियानों की आवश्यकता होनी चाहिए? सुशासन की वास्तविक विजय तब मानी जाएगी जब यह ‘तिहार’ एक सामयिक उत्सव न रहकर दैनिक प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन जाए, जहां किसी नागरिक को अपनी जायज मांग के लिए शिविर का इंतजार न करना पड़े।

वास्तव में, इस पूरे आयोजन के केंद्र में सरकार द्वारा अपनी ‘स्थिति टटोलने’ की एक सचेत राजनैतिक चेष्टा थी। किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए यह भांपना अनिवार्य होता है कि उसकी नीतियों की जमीनी हकीकत और उसे लेकर जनमानस की धारणा (पब्लिक परसेप्शन) में कितना सामंजस्य है। कई बार सचिवालय की बंद फाइलों और सांख्यिकीय दावों से इतर, गलियों और चौपालों की हकीकत भिन्न होती है। सुशासन तिहार के बहाने सरकार ने सीधे जनता की नब्ज पर हाथ रखकर यह समझने का प्रयास किया है कि उसकी कार्यशैली को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में किस प्रकार की सुगबुगाहट है। एन्टी-इन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के सूक्ष्म अंकुरों को समय रहते पहचानना और उन्हें जनहितैषी निर्णयों से रिप्लेस करना ही परिपक्व राजनीति का लक्षण है।

अब जब यह तिहार संपन्न हो चुका है, असली चुनौती इन 6 लाख आवेदनों के तार्किक और समयबद्ध निस्तारण की है। शिविरों की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि वहां कितनी भीड़ जुटी या कितने आवेदन जमा हुए; बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि आगामी कुछ हफ्तों में उनमें से कितने नागरिकों की समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ। यदि इन मांगों और शिकायतों का त्वरित और पारदर्शी निराकरण नहीं हुआ, तो यह जन-उत्साह निराशा में बदल सकता है।

संक्षेप में कहें तो, छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम एक सराहनीय लोकतांत्रिक पहल है, जिसने जनता को अपनी बात रखने का मंच दिया और शासन को आत्म-अवलोकन का अवसर। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सुशासन(Good Governance) तिहार से निकले निष्कर्षों का उपयोग सरकार अपनी भविष्य की नीतियों को अधिक जन-कल्याणकारी, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने में करेगी, ताकि ‘सुशासन’ केवल विज्ञापनों का शब्द न रहकर आम छत्तीसगढ़िया के जीवन का सहज अनुभव बन सके।

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