UPI पर अभी नहीं लगेगा कोई चार्ज, RBI गवर्नर ने दी राहत; जानिए क्या है 2,000 रुपये वाले नियम की चर्चा

नई दिल्ली: यूपीआई (UPI) से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के लिए फिलहाल राहत की खबर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया है कि अभी आम ग्राहकों पर यूपीआई लेनदेन के लिए कोई नया शुल्क नहीं लगाया जा रहा है।
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि फिलहाल यह तय करना जल्दबाजी होगी कि यदि भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किया जाता है, तो उसका खर्च कौन वहन करेगा। उन्होंने यह जरूर माना कि डिजिटल पेमेंट नेटवर्क को चलाने और सुरक्षित रखने में लागत आती है, जिसकी भरपाई किसी न किसी माध्यम से करनी होती है।
2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर क्या है चर्चा?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सरकार 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक (कमर्शियल) यूपीआई भुगतान पर 0.5 प्रतिशत से कम MDR लगाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। हालांकि, व्यक्ति से व्यक्ति (P2P) के बीच होने वाले यूपीआई ट्रांसफर को इस दायरे से बाहर रखा जा सकता है।
फिलहाल सरकार ने न तो कोई अंतिम फैसला लिया है और न ही किसी निश्चित दर या 2,000 रुपये की सीमा को कानून में शामिल किया है।
नए बिल में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त को ‘कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’ संसद में पेश किया है। इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार मिलेगा कि वह तय कर सके कि कौन-से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे और किन पर शुल्क लगाया जा सकता है।
जब तक यह विधेयक कानून नहीं बनता और नई अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक जनवरी 2020 से लागू जीरो-एमडीआर व्यवस्था ही जारी रहेगी। यानी ग्राहकों और व्यापारियों के लिए यूपीआई भुगतान पहले की तरह बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के चलता रहेगा।
आखिर MDR की मांग क्यों उठ रही है?
बैंक और डिजिटल पेमेंट कंपनियों का कहना है कि यूपीआई नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को बनाए रखने में भारी खर्च आता है। उनका तर्क है कि मौजूदा सरकारी प्रोत्साहन इस खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
जुलाई 2026 में यूपीआई के जरिए 23.66 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत 29.88 लाख करोड़ रुपये रही। ऐसे विशाल नेटवर्क को लंबे समय तक सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाने के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत महसूस की जा रही है।

