अमेरिका-ईरान पीस डील: क्या वाकई ईरान को मिल रहा है 300 अरब डॉलर का मुआवजा? जानें इस चर्चा की इनसाइड स्टोरी

दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक युद्धविराम समझौते ( US-Iran Peace Deal) के बाद वैश्विक स्तर पर 300 अरब डॉलर के भारी-भरकम फंड की चर्चा तेज हो गई है।
करीब चार दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहे ईरान के लिए इसे एक बड़े जैकपॉट के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, पहली नजर में यह मामला जितना सीधा दिखता है, इसकी असलियत उतनी ही जटिल है।
ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि यह ईरान को दिया जाने वाला कोई सीधा कैश पेमेंट या मुआवजे का चेक नहीं है, बल्कि कूटनीति और आर्थिक रणनीति के तहत तैयार किया गया एक अंतरराष्ट्रीय निवेश मंच (Investment Fund) है।
दुनिया भर के निवेशक और कंपनियां ईरान में पैसा लगाएंगी
इस प्रस्तावित फंड के जरिए अमेरिकी और खाड़ी देशों के साथ-साथ ( US-Iran Peace Deal) दुनिया भर के निवेशक और कंपनियां ईरान में पैसा लगाएंगी।
दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर और मलेशिया जैसे एशियाई देशों ने इसमें गहरी दिलचस्पी दिखाई है और खबर है कि आधे से अधिक फंड के लिए शुरुआती कमिटमेंट भी मिल चुकी है।
दरअसल, हालिया जंग में अपनी रिफाइनरियों, हवाई अड्डों और औद्योगिक ठिकानों को हुए नुकसान के बदले ईरान शुरुआत में 400 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग कर रहा था। अमेरिका सीधे तौर पर हर्जाना देने को राजी नहीं था, इसलिए दोनों पक्षों के बीच निवेश का यह बीच का रास्ता निकाला गया।
अधिकारी इसे परोक्ष मुआवजा ही मान रहे
भले ही अमेरिका इसे विकास और पुनर्निर्माण के लिए एक ‘डेवलपमेंट फंड’ ( US-Iran Peace Deal) कह रहा हो, लेकिन ईरान के अधिकारी इसे परोक्ष मुआवजा ही मान रहे हैं।
तेहरान का तर्क है कि अगर इस पैसे का इस्तेमाल युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने में होगा, तो तकनीकी रूप से यह नुकसान की भरपाई ही है।
ईरान इस विशाल रकम का इस्तेमाल अपने दशकों पुराने ऊर्जा क्षेत्र को आधुनिक बनाने और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े गैस व चौथे सबसे बड़े तेल भंडार की क्षमता का पूरी तरह दोहन करने के लिए करेगा। यह फंड न सिर्फ ईरान की तबाह अर्थव्यवस्था को नई जिंदगी दे सकता है, बल्कि पश्चिम एशिया के समीकरणों को भी बदल सकता है।

