राइस मिलों में बिक रहा गरीबों का हक? कैमरे में कैद हुई सरकारी चावल की सप्लाई, उठे बड़े सवाल

रायपुर-छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गरीबों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी PDS के तहत मिलने वाले सरकारी चावल की कथित हेराफेरी का मामला सामने आया है। आरोप है कि राशन दुकानों से हितग्राहियों के लिए निकलने वाला चावल कथित तौर पर राइस मिलों तक पहुंचाया जा रहा है। इस पूरे मामले में राशन दुकान संचालकों के साथ कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर सरकारी चावल गरीबों के लिए है, तो वह राइस मिल तक पहुंच कैसे रहा है?
राशन दुकान से निकला चावल… राइस मिल तक पहुंचा कैसे?
जानकारी के मुताबिक रायपुर के विधानसभा क्षेत्र में एक मालवाहक वाहन सरकारी चावल लेकर राइस मिल की ओर जाता हुआ कैमरे में कैद हुआ। पूछताछ में वाहन चालक ने कथित तौर पर बताया कि चावल लाखेनगर इलाके की एक राशन दुकान से लाया गया था।
अब इस एक गाड़ी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
चावल राशन दुकान से निकला तो क्या उसकी एंट्री हुई?
किसके नाम पर चावल जारी हुआ?
और अगर यह हितग्राहियों के लिए था, तो राइस मिल तक पहुंचने की जरूरत क्यों पड़ी?
यही वो सवाल हैं, जिनका जवाब जांच के बाद ही साफ हो पाएगा।
एक गाड़ी कैमरे में कैद… कहीं कहानी इससे बड़ी तो नहीं?
स्थानीय सूत्रों के दावे के मुताबिक छोटे मालवाहकों से लेकर बड़े ट्रकों तक के जरिए सरकारी चावल की आवाजाही राइस मिलों तक होने की बात कही जा रही है। कुछ दिन पहले नागरिक आपूर्ति निगम के गोदाम से निकला एक ट्रक भी विधानसभा क्षेत्र की एक राइस मिल तक पहुंचने की बात सामने आई थी।
अगर ये दावे सही हैं तो मामला सिर्फ एक वाहन तक सीमित नहीं रह जाता।
सवाल फिर पूरे सिस्टम की निगरानी पर उठता है।
आखिर सरकारी चावल की एक-एक बोरी का हिसाब रखने वाली व्यवस्था के बावजूद ऐसी आवाजाही कैसे हो रही है?
खराब चावल का बहाना… और फिर राइस मिल तक पहुंचने का आरोप!
हितग्राहियों की ओर से राशन के चावल की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें भी सामने आती रही हैं। कई जगह लोगों द्वारा खराब गुणवत्ता के कारण चावल लेने से इनकार करने की बात कही जाती है।
इसी बीच आरोप है कि कुछ राशन दुकान संचालक ऐसे हितग्राहियों को कथित तौर पर नकद राशि देकर उनका चावल अपने पास रख लेते हैं और बाद में उसे राइस मिलों में बेच देते हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे नेटवर्क की वास्तविकता जांच का विषय है।
लेकिन अगर ऐसा कोई खेल चल रहा है, तो इसका सीधा असर उस गरीब परिवार पर पड़ता है, जिसके नाम पर सरकारी राशन आवंटित होता है।
गुढ़ियारी से खमतराई तक… क्या चल रहा है कोई बड़ा खेल?
सूत्रों के दावों में गुढ़ियारी, खमतराई, भाठागांव और राजेंद्र नगर जैसे इलाकों का भी जिक्र किया जा रहा है। दावा है कि इन इलाकों में सरकारी चावल की संदिग्ध आवाजाही से जुड़े लोगों की गतिविधियां लंबे समय से जारी हैं।
अब सवाल है—क्या खाद्य विभाग को इसकी जानकारी है?
अगर जानकारी है तो जांच कहां तक पहुंची?
और अगर जानकारी नहीं है, तो फिर विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
खाद्य विभाग की कार्रवाई पर भी सवाल
सरकारी राशन की कथित हेराफेरी के आरोपों के बीच खाद्य विभाग की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि राइस मिलों की नियमित जांच और औचक निरीक्षण पर्याप्त स्तर पर नहीं हो रहे हैं।
वहीं रायपुर के खाद्य नियंत्रक भूपेंद्र मिश्रा का कहना है कि सरकारी चावल की हेराफेरी की जानकारी मिलने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। उनका कहना है कि राशन दुकानों में अनियमितता मिलने पर कई संचालकों के खिलाफ पहले भी एफआईआर दर्ज की जा चुकी है और शिकायत मिलने पर आगे भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन अब सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं है।
सवाल ये है कि सरकारी राशन की पूरी सप्लाई चेन की निगरानी आखिर कितनी मजबूत है?
राशन दुकान से लेकर गोदाम तक…
गोदाम से वाहन तक…
और वाहन से राइस मिल तक…
हर पड़ाव पर रिकॉर्ड और निगरानी होनी चाहिए।
क्योंकि अगर गरीबों के नाम पर जारी चावल कहीं और बिक रहा है, तो यह सिर्फ सरकारी अनाज की हेराफेरी का मामला नहीं होगा…



