SC/ST एक्ट का दुरुपयोग होता है, लेकिन दुर्लभ: पूर्व CJI बीआर गवई बोले- कानून खत्म करने के बजाय गलत इस्तेमाल रोकने के उपाय जरूरी

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 यानी SC/ST एक्ट को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने कहा है कि उन्होंने इस कानून के दुरुपयोग के मामले देखे हैं, लेकिन ऐसे मामले बहुत दुर्लभ हैं। उनके मुताबिक, केवल दुरुपयोग के आधार पर कानून को खत्म नहीं किया जा सकता। इसके बजाय कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय किए जाने चाहिए।
एक इंटरव्यू में जस्टिस गवई ने कहा कि यदि झूठी शिकायतों की समस्या सामने आती है तो संसद कानून में संशोधन कर ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई का प्रावधान कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून बनाना और उसमें बदलाव करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि अदालत की भूमिका न्यायिक समीक्षा तक सीमित है।
IIT बॉम्बे छात्र की मौत के बीच आया बयान
जस्टिस गवई की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब IIT बॉम्बे के एक छात्र की आत्महत्या के बाद एक प्रोफेसर के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज किए जाने को लेकर बहस चल रही है। हालांकि, जस्टिस गवई ने इस विशेष मामले पर टिप्पणी करने से इनकार किया। उनका कहना था कि किसी विचाराधीन मामले पर टिप्पणी करने से वह मीडिया ट्रायल का विषय बन सकता है।
‘दुरुपयोग के आधार पर कानून खत्म नहीं किया जा सकता’
जस्टिस गवई ने कहा कि किसी कानून के कुछ मामलों में गलत इस्तेमाल होने का मतलब यह नहीं है कि पूरा कानून असंवैधानिक या अमान्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में SC/ST एक्ट के प्रावधानों को वैध माना गया है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज होना हर मामले में स्वतः गिरफ्तारी का मतलब नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि कानून का इस्तेमाल उसे परेशान करने के लिए किया गया है, तो वह अदालत का रुख कर सकता है और अदालत उचित सुरक्षा दे सकती है।
NCRB के आंकड़े क्या बताते हैं?
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 30 जुलाई 2026 को राज्यसभा में 2020 से 2024 तक के NCRB आंकड़े पेश किए थे। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या 53,372 थी, जो इस अवधि में सबसे ज्यादा रही। 2024 में यह संख्या घटकर 48,669 हो गई।
वहीं, 2024 में इन मामलों में 5,192 मामलों में दोषसिद्धि दर्ज हुई, जो 2020-24 के दौरान सबसे अधिक थी। इसी साल दोषी ठहराए गए व्यक्तियों की संख्या 10,839 रही, जो 2020 के 4,855 के मुकाबले दोगुने से अधिक है।
गिरफ्तारियों और दोषसिद्धि का आंकड़ा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
– 2020: 61,925 गिरफ्तारियां और 4,855 दोषी ठहराए गए।
– 2021: करीब 58,700 गिरफ्तारियां और 5,141 दोषी।
– 2022: करीब 65,000 गिरफ्तारियां और करीब 9,070 दोषी।
– 2023: 61,747 गिरफ्तारियां और 7,858 दोषी।
– 2024: 55,286 गिरफ्तारियां और 10,839 दोषी।
2024 के अंत तक ट्रायल के लिए लंबित मामलों की संख्या 2,87,694 तक पहुंच गई थी, जो इन पांच वर्षों में सबसे अधिक थी।
क्या ये आंकड़े ‘झूठे मामलों’ की संख्या बताते हैं?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। NCRB के ये आंकड़े दर्ज मामलों, गिरफ्तारियों, चार्जशीट, दोषसिद्धि और लंबित मामलों की संख्या बताते हैं, लेकिन इनसे सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कितने मामले झूठे थे या कितने मामलों में SC/ST एक्ट का दुरुपयोग हुआ।
इसलिए जस्टिस गवई के ‘दुरुपयोग दुर्लभ है’ वाले आकलन और NCRB के अपराध संबंधी आंकड़े अलग-अलग चीजों को मापते हैं। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों से केवल मामलों की संख्या और उनके कानूनी परिणामों का पता चलता है; झूठी शिकायतों की कोई अलग समग्र संख्या इन आंकड़ों में नहीं दी गई है।
SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर पर भी रख चुके हैं राय
जस्टिस गवई SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत पर भी अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। State of Punjab vs Davinder Singh मामले में 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण को 6:1 के बहुमत से स्वीकार किया था। जस्टिस गवई इस पीठ का हिस्सा थे और उन्होंने SC/ST में क्रीमी लेयर की पहचान की आवश्यकता पर जोर दिया था।
उनका तर्क रहा है कि जो लोग आरक्षण के लाभ से सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी आगे निकल चुके हैं, उनके लिए आरक्षण के लाभ की निरंतरता के सवाल पर विचार होना चाहिए। इस राय को लेकर उन्हें अपने समुदाय के कुछ वर्गों की आलोचना का भी सामना करना पड़ा है।
इस तरह SC/ST एक्ट पर जस्टिस गवई की हालिया टिप्पणी का मुख्य जोर कानून समाप्त करने के बजाय उसके संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी सुरक्षा उपायों पर है। वहीं उपलब्ध NCRB आंकड़े कानून के तहत दर्ज मामलों और उनके परिणामों की तस्वीर देते हैं, लेकिन अपने आप में यह नहीं बताते कि इनमें कितने मामले झूठे या दुर्भावनापूर्ण थे।



