भारतीय अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूती, 7 से 8 फीसदी GDP ग्रोथ की उम्मीद; बैंक लोन और कॉरपोरेट प्रदर्शन बने सहारा

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अप्रैल-जून तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) आंकड़े महत्वपूर्ण संकेत देने वाले हैं। आर्थिक गतिविधियों से जुड़े कई संकेतकों के आधार पर इस तिमाही में GDP ग्रोथ 7 फीसदी से ऊपर रहने की उम्मीद जताई जा रही है। कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि विकास दर 8 फीसदी के करीब भी पहुंच सकती है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी हुई है।
अर्थव्यवस्था :GDP ग्रोथ को लेकर क्या है अनुमान
भारतीय रिजर्व बैंक ने अप्रैल-जून तिमाही में GDP ग्रोथ करीब 7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। वहीं, कई बैंकों और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक वृद्धि दर इससे अधिक हो सकती है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के अर्थशास्त्रियों ने GDP ग्रोथ 7.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की लगातार तीन तिमाहियों में वृद्धि दर 8.3 फीसदी, 8 फीसदी और 7.8 फीसदी रही है।
अर्थव्यवस्था :बैंक लोन की मांग में तेज उछाल
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बैंक कर्ज की मांग में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार जून के अंत तक बैंकों के नॉन-फूड क्रेडिट में सालाना आधार पर 18.3 फीसदी की वृद्धि हुई। किसी वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इससे अधिक वृद्धि जून 2012 में दर्ज की गई थी, जब यह दर 18.7 फीसदी थी।
सेक्टरवार आंकड़ों पर नजर डालें तो जून 2026 तक उद्योग क्षेत्र को दिए गए बैंक कर्ज में 19.2 फीसदी, सेवा क्षेत्र में 21.4 फीसदी और व्यक्तिगत कर्ज में 15.8 फीसदी की वृद्धि हुई। एक साल पहले इन क्षेत्रों में वृद्धि दर क्रमशः 6.3 फीसदी, 8.8 फीसदी और 11.7 फीसदी थी।
अर्थव्यवस्था :उद्योग और सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ा क्रेडिट
अर्थव्यवस्था में बैंक कर्ज की मांग का रुख भी बदलता दिखाई दे रहा है। कोरोना महामारी के बाद उद्योग क्षेत्र में कर्ज की मांग अपेक्षाकृत कमजोर रही थी, लेकिन 2025 के मध्य से इसमें लगातार सुधार देखने को मिला। बड़ी औद्योगिक इकाइयों को दिए जाने वाले बैंक क्रेडिट की वृद्धि जून 2025 के करीब 2 फीसदी से बढ़कर जून 2026 में 16.6 फीसदी हो गई।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह बदलाव अर्थव्यवस्था के ज्यादा उत्पादक क्षेत्रों में निवेश और गतिविधियों के बढ़ने का संकेत देता है। पश्चिम एशिया के संघर्ष से पैदा हुई अनिश्चितताओं के बावजूद उद्योग और सेवा क्षेत्र में कर्ज की मांग बनी हुई है।
कॉरपोरेट कंपनियों के नतीजों में भी सुधार
अप्रैल-जून तिमाही में सूचीबद्ध निजी गैर-वित्तीय कंपनियों के प्रदर्शन में भी मजबूती दिखाई दी। इन कंपनियों की बिक्री में सालाना आधार पर 19.4 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि जनवरी-मार्च तिमाही में यह वृद्धि 13.9 फीसदी थी। एक साल पहले अप्रैल-जून में बिक्री वृद्धि सिर्फ 5.5 फीसदी रही थी।
ऑपरेटिंग प्रॉफिट में भी 19.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह जनवरी-मार्च में दर्ज 9.8 फीसदी और एक साल पहले की समान अवधि में 7.3 फीसदी की वृद्धि से काफी अधिक है।
महंगाई और युद्ध के बावजूद अर्थव्यवस्था को सहारा
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे माल की लागत और ऊर्जा खर्च में बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल-जून तिमाही में कच्चे माल की लागत में 25.3 फीसदी और बिजली एवं ईंधन खर्च में 19.3 फीसदी की वृद्धि हुई। इसके बावजूद कंपनियों की बिक्री और मुनाफे में तेजी यह संकेत देती है कि आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार खपत और विनिर्माण क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सहारा दे रहे हैं। ऐसे में आने वाले GDP आंकड़े यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वैश्विक तनाव और ऊर्जा कीमतों के दबाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने किस हद तक मजबूती बनाए रखी है।



