तमन्ना भाटिया के ‘तुतक तुतक तुतिया’ गाने की असली कहानी,सिंधी लोकगीत ‘हो जमालो’ से जुड़ा है नाता

नई दिल्ली। तमन्ना भाटिया (Tamannaah) के गानों की बात हो तो ‘तुतक तुतक तुतिया’ का नाम जरूर आता है। यह गाना सुनते ही कई लोगों को इसके बोल ‘तुतक तुतक तुतिया, दही जमा लो’ जैसे सुनाई देते हैं। लेकिन इस मशहूर धुन के पीछे असल में एक पुराने सिंधी लोकगीत की कहानी छिपी है। यह गीत ‘हो जमालो’ के नाम से जाना जाता है और इसकी जड़ें आज के पाकिस्तान के सिंध इलाके से जुड़ी बताई जाती हैं।
‘हो जमालो’ सिंधी समुदाय का पारंपरिक लोकगीत है, जिसे खासतौर पर खुशी और उत्सव के मौकों पर गाया जाता है। हालांकि, इस गीत की लोकप्रियता के पीछे केवल संगीत नहीं, बल्कि साहस, एक खतरनाक पुल और मौत की सजा पाए एक कैदी की कहानी भी जुड़ी है।
सुक्कुर और रोहरी को जोड़ता था पुल
इस कहानी (Tamannaah) की शुरुआत साल 1889 के आसपास होती है। उस समय सिंध ब्रिटिश शासन के अधीन था। सिंधु नदी पर सुक्कुर और रोहरी को जोड़ने के लिए एक विशाल लोहे का पुल बनाया गया था। इसे लैंसडाउन ब्रिज के नाम से जाना जाता था।
यह पुल अपने समय की इंजीनियरिंग का बड़ा उदाहरण माना जाता था। इसे मुख्य रूप से रेल यातायात के लिए बनाया गया था, ताकि लोगों और सामान को नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाया जा सके। लेकिन पुल तैयार होने के बाद अंग्रेजी प्रशासन के सामने एक नई परेशानी खड़ी हो गई।
कई ट्रेन ड्राइवर इस पुल से ट्रेन चलाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें डर था कि इतना बड़ा और भारी रेल इंजन पुल का वजन नहीं संभाल पाएगा। हादसे की आशंका के कारण कोई भी ड्राइवर अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार नहीं था।
मौत की सजा पाए जमालो ने रखी शर्त
ऐसे समय में अंग्रेजी प्रशासन को ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जो इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार हो। इसी दौरान जमालो सीधी नाम के एक व्यक्ति का नाम सामने आया।
बताया जाता है कि जमालो सिंधी समुदाय से ताल्लुक रखता था और उसे किसी अपराध के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। जब उसे पुल पर ट्रेन चलाने की चुनौती के बारे में पता चला तो उसने अंग्रेजी प्रशासन के सामने एक शर्त रखी।
जमालो ने कहा कि वह ट्रेन को लैंसडाउन ब्रिज के ऊपर से चलाकर दूसरी तरफ ले जाने का जोखिम उठाएगा, लेकिन इसके बदले उसकी मौत की सजा माफ कर उसे रिहा किया जाए।
अंग्रेजी प्रशासन ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली। इसके बाद जमालो को ट्रेन चलाने की तैयारी और प्रशिक्षण दिया गया।
हजारों लोगों के सामने पार किया पुल
जिस दिन जमालो को ट्रेन लेकर पुल पार करना था, उस दिन बड़ी संख्या में लोग इस घटना को देखने के लिए जमा हुए। लोगों के मन में यह सवाल था कि क्या पुल वास्तव में ट्रेन का वजन सह पाएगा या फिर कोई बड़ा हादसा होगा।
जमालो ने ट्रेन को लैंसडाउन ब्रिज पर चलाया और सफलतापूर्वक उसे दूसरी तरफ पहुंचा दिया। पुल भी सुरक्षित रहा और जमालो की जान भी बच गई।
इस सफलता के साथ ही उसकी जिंदगी बदल गई। अंग्रेजी प्रशासन के साथ हुई शर्त के मुताबिक उसकी मौत की सजा माफ कर दी गई और उसे आजाद कर दिया गया।
खुशी में गूंजा ‘हो जमालो’
जमालो के ट्रेन से बाहर निकलते ही वहां मौजूद उसके परिवार और सिंधी समुदाय के लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। उसकी पत्नी और समुदाय के लोगों ने जश्न मनाते हुए उसका स्वागत किया।
इसी खुशी के दौरान ‘हो जमालो, वाह जमालो’ के जयकारे लगाए गए। माना जाता है कि इसी घटना से ‘हो जमालो’ लोकगीत की शुरुआत की कहानी जुड़ी है।
गीत में जमालो की जीत और सुक्कुर के पुल का जिक्र किया जाता है। इसकी पंक्तियों में उसकी बहादुरी और सुरक्षित लौटने की खुशी दिखाई देती है। धीरे-धीरे यह गीत केवल उस घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सिंधी समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया।
हर खुशी के मौके पर गाया जाने लगा
समय के साथ ‘हो जमालो’ सिंधी समुदाय के प्रमुख लोकगीतों में शामिल हो गया। शादी, पारिवारिक समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दूसरे खुशी के अवसरों पर इसे गाने की परंपरा बन गई।
इसकी धुन और बोल इतने लोकप्रिय हुए कि अलग-अलग कलाकारों और संगीतकारों (Tamannaah) ने इसे अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे यह लोकगीत सिंधी समुदाय की सीमाओं से बाहर भी पहुंच गया।
इसी लोकप्रिय धुन का आधुनिक रूप अलग-अलग फिल्मों और गानों में सुनाई देता रहा है। तमन्ना भाटिया से जुड़ा ‘तुतक तुतक तुतिया’ भी इसी धुन के कारण लोगों के बीच चर्चा में रहा। हालांकि कई लोग इसके वास्तविक बोल और इतिहास से अनजान रहे।
यानी जिसे कई लोग मजाकिया अंदाज में ‘दही जमा लो’ समझकर गाते रहे, उसके पीछे एक पुराने सिंधी लोकगीत ‘हो जमालो’ की कहानी बताई जाती है।
यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति के साहस से जुड़ी है, जिसने अपनी जिंदगी बचाने के लिए अंग्रेजी शासन की सबसे खतरनाक चुनौती स्वीकार की और ट्रेन को उस पुल के पार पहुंचाकर अपनी आजादी हासिल की।



