जातिगत जनगणना के सवालों पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, नाना भाऊ पटोले बोले- मौजूदा प्रारूप से सही आंकड़े मिलना मुश्किल

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नाना भाऊ पटोले ने जातिगत जनगणना के मौजूदा प्रारूप को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की ओर से तैयार की गई प्रश्नावली में ऐसी व्यवस्था रखी गई है, जिससे देश में विभिन्न जातियों की वास्तविक संख्या का सही आंकलन करना मुश्किल हो सकता है। पटोले ने मौजूदा प्रश्नावली को वापस लेकर नए सिरे से तैयार करने की मांग की है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जातिगत जनगणना के लिए ऐसी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, जिसमें पहले से प्रमाणित जातियों की सूची उपलब्ध हो। इसके लिए राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम लोगों से व्यापक चर्चा के बाद नई प्रश्नावली तैयार करने की बात कही गई है।
ओपन-एंडेड सवाल पर कांग्रेस की आपत्ति
पटोले के मुताबिक आगामी जनगणना के लिए तय किए गए 40 सवालों में एक सवाल ऐसा है, जिसमें जाति की जानकारी दर्ज करने के लिए ओपन-एंडेड विकल्प रखा गया है। कांग्रेस का कहना है कि इसमें नागरिक अपनी जाति या उपजाति का नाम खुद बताएगा और गणनाकर्मी उसे उसी तरह दर्ज करेगा।
उनका तर्क है कि भारत में एक ही जाति अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग नामों, स्थानीय बोलियों या उपजातियों के नाम से पहचानी जाती है। ऐसे में एक ही समुदाय के कई अलग-अलग नाम दर्ज होने की संभावना रहेगी।
ड्रॉपडाउन सूची से आंकड़ों में एकरूपता का तर्क
कांग्रेस ने जातिगत जनगणना में ड्रॉपडाउन सूची का विकल्प रखने की मांग की है। इसमें पहले से मान्य और प्रमाणित जातियों के नाम उपलब्ध होंगे, जिससे गणनाकर्मी नागरिक द्वारा बताई गई जाति को तय सूची में से चुन सकेगा।
पटोले का कहना है कि इस व्यवस्था से अलग-अलग नाम और वर्तनी के कारण पैदा होने वाली विसंगतियों को कम किया जा सकता है। उन्होंने तेलंगाना और बिहार में अपनाई गई पद्धति का उदाहरण देते हुए इसी तरह की व्यवस्था देशभर में लागू करने की मांग की।
ओबीसी की वास्तविक संख्या सामने आने पर भी सवाल
पटोले ने दावा किया कि मौजूदा प्रारूप में पिछड़ा वर्ग से जुड़ी स्पष्ट जानकारी का अभाव है। उनका कहना है कि यदि जातियों के नाम अलग-अलग तरीके से दर्ज होते हैं, तो तैयार होने वाला डेटा सामाजिक और प्रशासनिक नीतियों के लिए पर्याप्त रूप से उपयोगी नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना का उद्देश्य केवल संख्या जुटाना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध कराना होना चाहिए। कांग्रेस ने सरकार से प्रश्नावली पर दोबारा विचार कर पारदर्शी और प्रमाणित प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।



