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10 साल में बदली भारत के बॉन्ड बाजार की तस्वीर, अब आम निवेशकों के लिए भी खुले नए अवसर

पिछले एक दशक में भारत का बॉन्ड बाजार तेजी से विकसित हुआ है और अब यह केवल बड़े संस्थानों तक सीमित नहीं रहा। पहले जहां इस बाजार में मुख्य रूप से बैंक और बड़े निवेशक सक्रिय थे, वहीं अब डिजिटल प्लेटफॉर्म और नए नियामकीय सुधारों के चलते आम निवेशकों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है।

केयरएज रेटिंग्स के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 में कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार का आकार करीब 11 लाख करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर लगभग 59 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इस दौरान बाजार ने 13.1 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की। इससे बैंक एफडी के अलावा लंबी अवधि के निवेश के लिए एक नया विकल्प तैयार हुआ है।

छोटे निवेशकों की बढ़ी भागीदारी

इंडियाबॉन्ड्स की सह-संस्थापक अदिति मित्तल के मुताबिक, बॉन्ड बाजार में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025 में जहां बॉन्ड ट्रेड की संख्या 11.9 लाख थी, वहीं वित्त वर्ष 2026 में यह बढ़कर 28.4 लाख हो गई। इसी अवधि में प्रति ट्रेड का औसत आकार 46 प्रतिशत घटकर लगभग 78 लाख रुपये रह गया, जो छोटे निवेशकों की बढ़ती मौजूदगी का संकेत माना जा रहा है।

ग्रिप इन्वेस्ट के संस्थापक निखिल अग्रवाल का कहना है कि सेबी द्वारा लागू किए गए ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर (OBPP) ढांचे ने आम निवेशकों के लिए सुरक्षित डिजिटल माध्यम उपलब्ध कराया है। इसके जरिए अब निवेशक बॉन्ड SIP, सरकारी प्रतिभूतियों और अन्य फिक्स्ड-इनकम निवेश विकल्पों में आसानी से निवेश कर सकते हैं।

नियमों में बदलाव से मिली रफ्तार

बॉन्ड बाजार के विस्तार में नियामकीय सुधारों की भी अहम भूमिका रही है। केयरएज रेटिंग्स के वरिष्ठ अर्थशास्त्री सरबर्थो मुखर्जी के अनुसार, निवेशकों की सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।

रिजर्व बैंक ने 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए 30 प्रतिशत निवेश सीमा समाप्त कर दी। वहीं, 2020 में शुरू किए गए फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के कारण विदेशी निवेश में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। वित्त वर्ष 2025 में FAR बॉन्ड्स में विदेशी निवेश बढ़कर 1.32 लाख करोड़ रुपये के पांच साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसके अलावा, सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड और सस्टेनेबिलिटी से जुड़े नए वित्तीय उत्पादों ने भी बाजार को नई दिशा दी है।

अभी भी बनी हुई हैं चुनौतियां

तेजी से विकास के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं। वित्त वर्ष 2026 में गैर-वित्तीय कंपनियों द्वारा जुटाए गए लगभग 45 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में 65 प्रतिशत हिस्सा अब भी बैंकों से आया। इससे स्पष्ट है कि कॉर्पोरेट फंडिंग के लिए बॉन्ड बाजार अभी भी प्रमुख स्रोत नहीं बन पाया है।

इसके अलावा, बाजार में उच्च रेटिंग वाले बॉन्ड्स का दबदबा बना हुआ है। कुल बाजार का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा AAA रेटिंग वाले बॉन्ड्स का है, जबकि AA रेटिंग वाले बॉन्ड्स की हिस्सेदारी करीब 19 प्रतिशत है। सख्त निवेश नियमों के कारण कम रेटिंग वाली कंपनियों के लिए बॉन्ड के जरिए पूंजी जुटाना अभी भी चुनौती बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में तरलता (Liquidity) बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और व्यापक निवेशक आधार तैयार करने की दिशा में आगे भी सुधार जरूरी होंगे। तभी भारतीय बॉन्ड बाजार बैंकिंग प्रणाली का एक मजबूत और प्रभावी विकल्प बन सकेगा।

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