छत्तीसगढ़ में ₹1000 के पार हुआ LPG
टूटती कमर और बेहिसाब महंगाई से कराह उठा आम आदमी

रायपुर। मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के बजट पर एक बार फिर सबसे बड़ा प्रहार हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार और वैश्विक उथल-पुथल (अमेरिका-ईरान तनाव) का हवाला देते हुए सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू रसोई गैस (LPG) की कीमतों में ₹29 प्रति सिलेंडर की भारी बढ़ोतरी कर दी है। इस ताजा वृद्धि के बाद राजधानी रायपुर समेत पूरे छत्तीसगढ़ में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत ₹1,000 के जादुई और डरावने आंकड़े को पार करते हुए ₹1,013 पर पहुंच गई है।
यह केवल ₹29 की बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि पिछले तीन महीनों के भीतर आम जनता की जेब पर मारा गया दूसरा बड़ा हथौड़ा है। इससे पहले 7 मार्च को सिलेंडर के दाम ₹60 बढ़ाए गए थे, यानी महज 90 दिनों के भीतर घरेलू रसोई गैस ₹89 महंगी हो चुकी है। वहीं, 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत भी ₹52 बढ़कर ₹3,346.50 हो गई है। इस बेहिसाब महंगाई ने आम आदमी को कराहने पर मजबूर कर दिया है और प्रदेश के लाखों परिवारों की रीढ़ तोड़ कर रख दी है।
थाली से गायब हो रहा स्वाद:
सुबह उठते ही हर घर में सबसे पहली चिंता रसोई की होती है, लेकिन अब उसी रसोई में जाने से आम गृहिणियों का दिल दहलने लगा है। गैस सिलेंडर का ₹1013 का कांटा आम आदमी की छाती पर पत्थर की तरह भारी लग रहा है। रायपुर के एक स्थानीय मोहल्ले में रहने वालीं गृहणियों के मुताबिक “कमाई अठन्नी है और खर्चा रुपैया। सरकार को लगता है कि ₹29 ही तो बढ़े हैं, लेकिन हमारे लिए यह ₹29 दूध, सब्जी और बच्चों की स्कूल फीस में कटौती करने जैसा है। गैस सिलेंडर अब जरूरत नहीं, बल्कि रईसों की चीज बनता जा रहा है।”
यह कराह सिर्फ एक गृहणी की नहीं, बल्कि प्रदेश के हर उस नागरिक की है जो रोज कुआं खोदता है और रोज पानी पीता है। एक आम दिहाड़ी मजदूर या निजी नौकरी में ₹10,000 से ₹15,000 कमाने वाले व्यक्ति के लिए महीने की शुरुआत में ही ₹1000 से ज्यादा सिर्फ गैस के लिए अलग निकाल देना, उसकी कमर तोड़ने के लिए काफी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे बच्चों को अच्छी शिक्षा दें, बीमार बुजुर्गों की दवा खरीदें या सिर्फ पेट भरने के लिए ईंधन का इंतजाम करें।
सिर्फ गैस नहीं, चौतरफा महंगाई से बढ़ती बेचैनी
आम जनता की बेचैनी सिर्फ एलपीजी सिलेंडर के महंगे होने से नहीं है, बल्कि बाजार में मचे चौतरफा हाहाकार से है। रसोई गैस की इस आग को पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों ने हवा दी है। मई के मध्य से अब तक पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग ₹7.50 प्रति लीटर की संचयी बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं, वाहनों और ऑटो में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी भी करीब ₹6 प्रति किलो महंगी हो गई है।
ईंधन की इस आग का सीधा असर मालभाड़े (ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट) पर पड़ा है, जिसके कारण मंडियों में हरी सब्जियां, दालें, खाद्य तेल और राशन का सामान आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। बाजार जाने वाले लोग खाली थैला और उदास चेहरा लेकर लौट रहे हैं। मध्यम वर्ग के भीतर एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी है। वह अपनी सामाजिक साख बचाने के लिए न तो किसी के सामने हाथ फैला पा रहा है और न ही इस बेहिसाब महंगाई के बोझ को सह पा रहा है।
बाहर खाना और शादियां भी हुईं भारी
एक तरफ घरेलू बजट ध्वस्त हुआ है, तो दूसरी तरफ कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹3,346.50 होने से बाजार का पूरा गणित बिगड़ गया है। छत्तीसगढ़ में इस सीजन में हजारों शादियां और सामाजिक कार्यक्रम होने हैं। कमर्शियल गैस के दाम बढ़ने से कैटरिंग और टेंट का खर्च सीधे 10 से 15 फीसदी तक बढ़ गया है।
रायपुर होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि कमर्शियल सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसका सीधा असर यह होगा कि होटलों और ठेलों पर मिलने वाला समोसा, पोहा, थाली और चाय भी महंगी हो जाएगी। यानी जो आम आदमी घर के बजट से परेशान होकर कभी-कभार बाहर खाने की सोचता था, अब उसके लिए बाहर का खाना भी दूभर हो जाएगा। छोटे ठेले और गुमटी चलाने वाले दुकानदार इस बात से चिंतित हैं कि अगर उन्होंने खाने के दाम बढ़ाए तो ग्राहक टूट जाएंगे, और अगर नहीं बढ़ाए तो वे खुद कर्ज के दलदल में डूब जाएंगे।
फिर से धुएं की तरफ लौटते कदम
इस महंगाई का सबसे दर्दनाक और स्याह पहलू ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है। सरकार ने ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत बड़े जोर-शोर से गरीब महिलाओं को गैस कनेक्शन बांटे थे ताकि उन्हें धुएं से मुक्ति मिल सके। लेकिन आज जब सिलेंडर की कीमत ₹1,000 पार हो चुकी है, तो छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों (जैसे बस्तर, सरगुजा, गरियाबंद) में गरीब परिवारों ने खाली सिलेंडरों को घर के कोने में शोपीस बनाकर रख दिया है।
बस्तर के सुदूर गांव की रहने वाली महिलाएं बताती हैं, “साहब, जब मजदूरी ही दिन की ₹250-₹300 मिलती है, तो हजार रुपए का सिलेंडर कैसे भराएं? दो महीने से सिलेंडर खाली पड़ा है। अब फिर से जंगल से सूखी लकड़ियां और कंडे बीनकर चूल्हा सुलगना पड़ रहा है।” यह स्थिति सरकार के उन दावों की पोल खोलती है जिसमें धुएं से मुक्ति की बात कही गई थी। महंगाई ने ग्रामीण महिलाओं को दोबारा उसी जानलेवा धुएं और चूल्हे की तरफ ढकेल दिया है जिससे उन्हें बाहर निकालने का वादा किया गया था।
कंपनियों का तर्क बनाम जनता का दर्द
तेल विपणन कंपनियों और उद्योग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि मार्च के बाद से ही वैश्विक स्तर पर विशेषकर पश्चिम एशिया के तनाव और अमेरिका-ईरान युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। कंपनियों का कहना है कि इस बढ़ोतरी के बावजूद उन्हें प्रति घरेलू सिलेंडर पर भारी घाटा उठाना पड़ रहा है, और सरकार पूरा बोझ जनता पर न डालकर कुछ हिस्सा खुद वहन कर रही है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि कंपनियों के इस घाटे और मुनाफे के खेल में आम नागरिक को क्यों पीसा जा रहा है? अंतर्राष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का ठीकरा हमेशा आम आदमी के सिर पर ही क्यों फोड़ा जाता है? जब वैश्विक बाजार में कीमतें गिरती हैं, तब उसका आनुपातिक लाभ जनता तक इतनी तेजी से क्यों नहीं पहुंचाया जाता?
सुलगते सवाल और खामोश हुक्मरान
छत्तीसगढ़ की जनता आज बुनियादी सवालों के घेरे में खड़ी है। चारों तरफ से बढ़ती इस महंगाई ने परिवारों के मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य को बिगाड़ दिया है। मध्यमवर्गीय परिवारों में बचत के नाम पर अब कुछ नहीं बच रहा है; लोग अपनी जमा-पूंजी निकाल कर रोजमर्रा के खर्च पूरे कर रहे हैं। युवाओं की पढ़ाई, बुजुर्गों का इलाज और परिवारों की खुशियां इस एलपीजी की आग में झुलस रही हैं।
₹1013 का यह गैस सिलेंडर केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के नीति-नियंताओं के सामने आम आदमी की बेबसी, उसकी टूटती उम्मीदों और उसके रसोई की सुलगती हुई हकीकत का जीवंत दस्तावेज है। अब देखना यह है कि क्या सरकार टैक्सों में कटौती कर आम जनता को इस चौतरफा मार से कोई राहत देती है, या फिर ‘महंगाई की यह कड़वी घूंट’ पीना आम आदमी की नियति बनी रहेगी।

