नक्सलवाद ने उजाड़ दिया ताड़पाला गांव, 30 साल से ग्रामीणों का पता नहीं; अब जंगल में सिर्फ सुरक्षा बलों का डेरा

कभी कर्रेगुट्टा की तलहटी में बसा ताड़पाला गांव ग्रामीणों की आवाजाही और खेती-किसानी से गुलजार रहता था। जंगल से मिलने वाली चीजों से ग्रामीण सामान तैयार कर आसपास के बाजारों में बेचते थे। लेकिन 1990 के दशक के मध्य में इलाके में नक्सलियों का प्रभाव बढ़ने के बाद धीरे-धीरे पूरा गांव खाली हो गया। ग्रामीण अपने घर छोड़कर चले गए और दोबारा वापस नहीं लौटे।
ताड़पाला बीजापुर जिले के पुजारी कांकेर गांव का आश्रित गांव बताया जाता है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, 1995-96 तक यहां लोग रहते थे। उस समय गांव से होकर ग्रामीण बाजारों तक पहुंचते थे। बाद में यही रास्ता नक्सलियों के लिए तीन राज्यों के बीच आवाजाही का प्रमुख कॉरिडोर बन गया।
ग्रामीणों का रिकॉर्ड तक उपलब्ध नहीं
ताड़पाला के ग्रामीण करीब तीन दशक पहले गांव छोड़कर कहां चले गए, इसकी स्पष्ट जानकारी अब प्रशासन के पास भी नहीं है। मोबाइल और संचार सुविधाओं के अभाव के साथ लंबे समय तक इलाके में प्रशासनिक पहुंच नहीं होने के कारण यहां रहने वाले परिवारों का पूरा रिकॉर्ड तैयार नहीं हो सका।
बीजापुर कलेक्टर विश्वदीप कुमार के मुताबिक, ताड़पाला फिलहाल वीरान है और यह क्षेत्र दो राज्यों की सीमा से जुड़ा हुआ है। सुरक्षा कैंप वाला हिस्सा बीजापुर जिले में आता है, जबकि गांव का बड़ा हिस्सा तेलंगाना की ओर है।
कर्रेगुट्टा की पहाड़ियां लंबे समय तक नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनी रहीं। जंगल और पहाड़ी इलाकों का फायदा उठाकर नक्सली यहां से बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों में गतिविधियां संचालित करते थे। सुरक्षा बलों के मुताबिक, इस क्षेत्र में हथियार और आईईडी तैयार करने का नेटवर्क भी सक्रिय था।
2025 में सुरक्षा कैंप बनने के बाद बदली तस्वीर
लंबे समय तक नक्सलियों के प्रभाव में रहने के बाद वर्ष 2025 में सुरक्षा बलों ने ताड़पाला में बेस कैंप स्थापित किया। पहाड़ी के ऊपर भी सुरक्षा कैंप बनाया गया। अब गांव में ग्रामीण परिवारों की जगह सुरक्षा बलों की मौजूदगी दिखाई देती है।
इलाके में सड़क निर्माण का काम भी जारी है। सड़क बनने से सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ रही है और लंबे समय से दुर्गम रहे क्षेत्र को मुख्य मार्गों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, आईईडी के खतरे को देखते हुए जंगल के अंदर आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही।
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा है कि क्षेत्र अब नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त हो चुका है। उनके मुताबिक, जिन परिस्थितियों के कारण ग्रामीणों को गांव छोड़ना पड़ा था, वे खत्म हो गई हैं और ग्रामीण चाहें तो वापस लौट सकते हैं।
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल उन परिवारों का है जिन्होंने 20 से 30 साल पहले ताड़पाला छोड़ा था। वे अब कहां रह रहे हैं, उनकी जमीन और संपत्ति की स्थिति क्या है और उनकी अगली पीढ़ी गांव में दोबारा बसना चाहती है या नहीं, इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।



