भारत में छाया पाकिस्तानी गाना ‘छलरे छलरे वाल’, रील्स से मिली पहचान; सिंगर्स ने बताया वायरल होने का राज
भारत में मिली लोकप्रियता के बाद पाकिस्तान में भी बढ़ी गाने की पहचान, सराइकी भाषा और संस्कृति की भी हो रही चर्चा

दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों पाकिस्तानी गाना ( Pakistani song) ‘छलरे छलरे वाल’ खूब ट्रेंड कर रहा है। इंस्टाग्राम रील्स से लेकर दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक इस गाने पर लोग वीडियो बना रहे हैं।
गाने के बोल, धुन और खास अंदाज ने भारतीय दर्शकों का ध्यान खींचा है। इसे शानजे सियाल और मोहसिन लशारी ने गाया है। खास बात यह है कि दोनों गायकों को भारत से मिल रहे प्यार ने उत्साहित किया है। एक इंटरव्यू में शानजे सियाल ने बताया कि गाने को भारत में जिस तरह लोकप्रियता मिली, वैसी पहचान पाकिस्तान में शुरुआत में नहीं थी।
भारत में वायरल हुआ, फिर पाकिस्तान में बढ़ी लोकप्रियता
शानजे सियाल के मुताबिक, उन्होंने सबसे पहले ( Pakistani song) ‘छलरे छलरे वाल’ को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। शुरुआत में गाने के कुछ बोल लोगों के बीच लोकप्रिय हुए। इसके बाद भारतीय दर्शकों ने इसे पसंद करना शुरू किया और इस पर लगातार रील्स बनने लगीं। गाने की लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही इसे लेकर चर्चा भी तेज हो गई।
शानजे ने बताया कि भारत के कई बड़े सितारों ने भी उनके काम की तारीफ की। भारतीय दर्शकों से मिले इस रिस्पॉन्स ने गाने को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में मदद की। उनके मुताबिक, पाकिस्तान में शुरुआत में कम लोग इस गाने को जानते थे, लेकिन भारत में वायरल होने के बाद वहां भी इसकी पहचान बढ़ने लगी।
भारतीय इन्फ्लुएंसर्स की रील्स ने बढ़ाई पहुंच
गाने के वायरल होने में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका भी अहम रही। भारतीय क्रिएटर्स ने इस गाने पर रील्स बनाईं, जिन्हें लोगों ने पसंद किया और आगे शेयर किया। इससे गाना उन दर्शकों तक भी पहुंचा, जो पहले सराइकी संगीत से परिचित नहीं थे।
शानजे सियाल ने बताया कि पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में लोग भारत के सोशल मीडिया ट्रेंड्स से प्रभावित होते हैं। जब भारतीय इन्फ्लुएंसर्स ने इस गाने पर वीडियो बनाने शुरू किए, तो पाकिस्तान में भी इसकी चर्चा बढ़ने लगी। बाद में इसे सराइकी भाषा और संस्कृति से जोड़कर भी प्रचारित किया जाने लगा।
सराइकी भाषा और संस्कृति भी चर्चा में
‘छलरे छलरे वाल’ की लोकप्रियता ( Pakistani song) ने सराइकी भाषा को भी सोशल मीडिया पर चर्चा में ला दिया है। सराइकी पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब, उत्तरी सिंध और खैबर पख्तूनख्वा के दक्षिणी हिस्सों में बोली जाती है। इस भाषा में गाए जाने वाले गीतों में स्थानीय संस्कृति, पहनावे और भावनाओं की झलक देखने को मिलती है।
शानजे के मुताबिक, पहले सराइकी भाषा में गाने वाले कलाकारों को लेकर कुछ लोगों की सोच अलग थी। हालांकि, इस गाने को मिली लोकप्रियता ने भाषा और इससे जुड़ी सांस्कृतिक पहचान को नए दर्शकों तक पहुंचाने में मदद की है। सोशल मीडिया पर गाने के बोल और उनके अर्थ को लेकर भी लोग दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
मोहसिन लशारी बोले- भारत से मिल रहा बहुत प्यार
गाने के दूसरे गायक मोहसिन लशारी ने भी भारतीय दर्शकों से मिल रहे प्यार पर खुशी जताई। उन्होंने बताया कि उनके वीडियो के कमेंट सेक्शन में बड़ी संख्या में लोग भारत से प्यार भेजने की बात लिखते हैं। उनके लिए यह प्रतिक्रिया खास है, क्योंकि इससे उनका संगीत सीमाओं के पार नए लोगों तक पहुंच रहा है।
मोहसिन के मुताबिक, सोशल मीडिया पर मिलने वाले कमेंट्स और प्रतिक्रियाओं ने गाने को लोकप्रिय बनाने में मदद की है। भारतीय दर्शकों की दिलचस्पी ने दोनों गायकों को ऐसे लोगों तक पहुंचाया, जो पहले उनके संगीत के बारे में नहीं जानते थे।
क्या है ‘छलरे छलरे वाल’ का मतलब?
गाने के बोल किसी की खूबसूरती, बालों और पहनावे की तारीफ करते हैं। ‘छलरे-छलरे वाल’ का भाव घुंघराले और लहराते बालों से जुड़ा है। गाने में काली शॉल, लाल रुमाल और आकर्षक अंदाज का जिक्र भी आता है।
‘तू सांवल फूल कस्तूरी’ पंक्ति में किसी की तुलना सांवले रंग के खूबसूरत फूल से की गई है, जिसकी खुशबू कस्तूरी जैसी मनमोहक है। वहीं, ‘तेरी थी गई बहु मशूरी’ का भाव है कि उस व्यक्ति की खूबसूरती के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए हैं।
‘झा-झा ते, हर झा ते, पाए देंदे लोक मिसाल’ में लोगों के बीच उसकी खूबसूरती की चर्चा होने की बात कही गई है। ‘छलरे-छलरे वाल, मोंढे रखदैं काली शॉल’ में घुंघराले बालों और कंधों पर रखी काली शॉल के जरिए उसके लुक को बयां किया गया है। वहीं, लाल रुमाल वाली पंक्ति में उसके अनोखे अंदाज की तारीफ की गई है।
सोशल मीडिया ने मिटाई संगीत की सीमाएं
‘छलरे छलरे वाल’ की लोकप्रियता बताती है कि सोशल मीडिया के दौर में किसी क्षेत्रीय भाषा का गीत भी सीमाओं के पार पहचान बना सकता है। भारतीय दर्शकों की पसंद, इन्फ्लुएंसर्स की रील्स और लोगों के बीच गाने को साझा करने की आदत ने इसे नए श्रोताओं तक पहुंचाया।
शानजे सियाल और मोहसिन लशारी के लिए यह गाना भारत में पहचान बनाने का जरिया बना है। इसके साथ ही सराइकी भाषा और संस्कृति को भी व्यापक दर्शकों के बीच जगह मिली है। यह ट्रेंड दिखाता है कि संगीत की भाषा भले अलग हो, लेकिन धुन, भाव और प्रस्तुति लोगों को जोड़ने का काम कर सकते हैं।



