RBI सख्त: विदेश में 1 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश करने पर कंपनियों को देना होगा पूरा ब्योरा

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय कंपनियों के बड़े विदेशी निवेश पर निगरानी बढ़ा दी है। अब 1 अरब डॉलर से अधिक के ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) के लिए कंपनियों को सौदे से जुड़ी विस्तृत जानकारी देनी होगी। इसके अलावा, यदि कोई कंपनी अपनी कुल नेटवर्थ की चार गुना सीमा से अधिक विदेश में निवेश करती है, तो उसे भी कड़ी जांच से गुजरना होगा। रुपये में उतार-चढ़ाव और देश से डॉलर बाहर जाने की स्थिति को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
विदेशी निवेश पर नहीं लगी रोक, लेकिन जांच होगी सख्त
नई व्यवस्था के तहत RBI ने प्रमुख बैंकों को एक विस्तृत चेकलिस्ट दी है। इसके जरिए बैंकों को विदेशी निवेश से जुड़े सौदों की वजह, वित्तीय स्थिति और संभावित जोखिमों की जांच करनी होगी। वित्त वर्ष 2026 में भारतीय कंपनियों का विदेशी निवेश 30 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया, जबकि पांच साल पहले यह लगभग 11 अरब डॉलर था।
बैंकों को निर्देश दिया गया है कि वे केवल विदेशी कंपनी की वैल्यूएशन रिपोर्ट के आधार पर सौदे को मंजूरी न दें। उन्हें स्वतंत्र रूप से यह भी जांचना होगा कि कंपनी की वास्तविक कीमत के मुकाबले कितना प्रीमियम दिया जा रहा है। यदि सौदा शेयरों की अदला-बदली के जरिए होता है, तो दोनों कंपनियों के मूल्यांकन के आधार पर एक्सचेंज रेश्यो की भी जांच की जाएगी।
कंपनियों को बताना होगा विदेश में निवेश का कारण
बैंकों को निवेश करने वाली कंपनियों की कमाई, पुराने विदेशी निवेश के अनुभव, मौजूदा देनदारियों और आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता का आकलन करना होगा। कंपनियों से यह भी पूछा जाएगा कि उन्होंने किसी भारतीय कंपनी के बजाय विदेशी कंपनी को खरीदने का फैसला क्यों किया है।
इसके साथ ही उन्हें बताना होगा कि विदेशी निवेश उनके मौजूदा कारोबार से किस तरह जुड़ा है, संबंधित कंपनी कारोबार संचालित करती है या केवल निवेश रखने वाली इकाई है और सौदे से कितना मुनाफा मिलने की उम्मीद है। निवेश कितने समय तक बनाए रखा जाएगा और उससे बाहर निकलने की योजना क्या है, इसकी जानकारी भी देनी होगी।
भारत को होने वाले फायदे का भी देना होगा हिसाब
नई जांच प्रक्रिया में विदेशी कंपनी की विश्वसनीयता और संबंधित देश के जोखिम का आकलन भी शामिल होगा। यदि सौदे में आपस में जुड़ी कंपनियां शामिल हैं या भारत से बाहर मूल्य हस्तांतरित होने की आशंका है, तो बैंक अतिरिक्त जांच कर सकते हैं।
कंपनियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनके विदेशी निवेश से भारत के निर्यात में कितनी बढ़ोतरी होगी, आयात पर निर्भरता कैसे कम होगी और नए बाजारों तक पहुंच बनाने में क्या मदद मिलेगी। इसके अलावा, नई तकनीक और बौद्धिक संपदा भारत में लाने तथा लाभांश या शुल्क के रूप में देश में पैसा वापस आने की संभावनाओं का भी ब्योरा देना होगा।
यदि भारतीय मूल कंपनी अपनी विदेशी इकाई को कर्ज दिलाने के लिए गारंटी देती है, तो बैंक भविष्य में उस गारंटी के इस्तेमाल से पैदा होने वाले वित्तीय जोखिम की भी जांच करेंगे। इस कदम का उद्देश्य बड़े विदेशी निवेशों की पारदर्शिता बढ़ाना और भारतीय कंपनियों के साथ देश की अर्थव्यवस्था को संभावित नुकसान से बचाना है।



