विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा थे: भागवत

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत (Bhagwat) ने कहा कि 1947 के विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि संघर्ष के योद्धा थे।
उन्होंने कहा कि इन लोगों ने मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति प्रेम के कारण कठिनाइयों का सामना किया और बेहतर जीवन के बजाय अपने मूल्यों को प्राथमिकता दी।
नागपुर में सिंधु एजूकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए भागवत (Bhagwat) ने कहा कि विभाजन के समय अनेक परिवारों ने पाकिस्तान में अपनी संपत्ति, कारोबार और जीवन की स्थापित व्यवस्था छोड़कर भारत आने का फैसला किया।
उनका उद्देश्य केवल सुरक्षित स्थान पर पहुंचना नहीं था, बल्कि ऐसी भूमि पर रहना था जहां वे बिना किसी भय के अपने धर्म और संस्कृति का पालन कर सकें।
भागवत ने कहा, “वे विस्थापित जरूर थे, लेकिन शरणार्थी नहीं थे। वे ऐसे योद्धा थे जिन्होंने देश और धर्म के लिए कष्ट सहना स्वीकार किया। उन्होंने धन और करियर के बजाय अपनी मातृभूमि और मूल्यों को चुना।”
उन्होंने जीवन में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में कभी हार नहीं माननी चाहिए। संघर्ष के बाद दोबारा खड़े होने का प्रयास ही व्यक्ति को अंततः सफलता तक पहुंचाता है।
आरएसएस प्रमुख (Bhagwat) ने शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि शिक्षकों के आचरण और जीवन मूल्यों से भी विद्यार्थियों का व्यक्तित्व निर्माण होना चाहिए।
उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना है जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा सकारात्मक बदलाव में योगदान दे।
उन्होंने सिंधु एजूकेशन सोसाइटी की 75 वर्षों की यात्रा की सराहना करते हुए इसे समाज सेवा और मूल्य-आधारित शिक्षा का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।

